केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने आज भुज, कच्छ (गुजरात) में महान भारतीय बस्टर्ड (एक मैदानी पक्षी) की संरक्षण स्थिति, घासस्थल पुनर्स्थापना और चीता परियोजना से संबंधित प्रमुख कार्यक्रमों की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस समीक्षा बैठक में गुजरात सरकार के वन और पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कैबिनेट मंत्री श्री अर्जुन मोढवाड़िया भी उपस्थित थे।
इस अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, गुजरात वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान और राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे।
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि संरक्षण को अब केवल एकल प्रजाति तक सीमित न रखकर वैज्ञानिक प्रबंधन, आवास पुनर्स्थापन और समुदाय की भागीदारी को मिलाकर संपूर्ण भू-दृश्यों के पुनर्स्थापन की ओर बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत भू-दृश्य-स्तरीय संरक्षण में वैश्विक मानक बनने की दिशा में काम कर रहा है।
श्री यादव ने गुजरात में गंभीर रूप से संकटग्रस्त महान भारतीय बस्टर्ड (GIB) के संरक्षण के लिए नए सिरे से किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला, जहाँ, उनके अनुसार, कच्छ एक महत्वपूर्ण लेकिन छोटी और अलग-थलग आबादी का समर्थन करता है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) द्वारा गुजरात वन विभाग के सहयोग से तैयार किए गए “GIB संरक्षण के लिए गुजरात एक्शन प्लान” को जारी करते हुए मंत्री ने कहा कि यह योजना 30 से अधिक पक्षियों की न्यूनतम व्यवहार्य आबादी स्थापित करने और 200–500 वर्ग किमी सुरक्षित, सतत आवास सुनिश्चित करने के लिए एक विज्ञान-आधारित रोडमैप प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि तत्काल फोकस लगभग 200 वर्ग किमी के लाला–रावा भू-दृश्य पर है, जिसमें आवास पुनर्स्थापन, चराई प्रबंधन, आक्रामक प्रजातियों को हटाना, शिकारी प्रबंधन और बुनियादी ढांचे से जुड़े खतरों को कम करने जैसे हस्तक्षेप शामिल हैं।
श्री यादव ने बताया कि इस आबादी को सुरक्षित करने के लिए पहले ही महत्वपूर्ण भू-स्तरीय कार्रवाई की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि नालिया में आक्रामक प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा से ग्रसित लगभग 11 वर्ग किमी घासस्थल को पुनर्स्थापित किया गया है, और 15 वर्ग किमी को घेरने वाली 30 किमी लंबी शिकारी-रोधी बाड़ के साथ इसको सुरक्षित किया गया है। साथ ही घोंसले के शिकारियों का लक्षित प्रबंधन भी किया गया है। श्री यादव ने आगे जोर दिया कि GIB संरक्षण अंततः कच्छ के खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण है, जो, उनके अनुसार, छोटे फ्लोरिकन, चिंकारा, रेगिस्तानी बिल्लियों, रैप्टर्स, गिद्धों और अन्य विशेषज्ञ वन्यजीवों का भी संरक्षण समर्थन करते हैं।
