जो चीज नारियल की भूसी के रूप में शुरू होती है, वो आज भारत के नारियल उत्पादक क्षेत्रों में उद्यम और आजीविका का स्रोत बन रही है। नारियल का रेशा, एक प्राकृतिक, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल रेशा है, जो पीढ़ियों से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहा है। आज उद्यमी तेजी से इसे चटाई और रस्सी से लेकर हस्तशिल्प, जैव-उर्वरक और नवाचारी पैकेजिंग समाधानों तक विभिन्न मूल्यवर्धित उत्पादों में परिवर्तित कर रहे हैं। इस परिवर्तन के पीछे हजारों ग्रामीण उद्यमी और कारीगर हैं, जो एक पारंपरिक गतिविधि को आधुनिक आजीविका के साधन में बदल रहे हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई), विशेष रूप से कॉयर बोर्ड और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के माध्यम से मिलने वाले सहयोग से कॉयर स्वरोजगार, महिला सशक्तिकरण और स्थानीय आर्थिक विकास का मार्ग बन रहा है।
कॉयर अपशिष्ट को सफल उद्यम में बदलना:
एक उद्यम, 120 महिलाएं, अनगिनत अवसर
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कडियाम में सुश्री अल्लम गौथमी ने नारियल के रेशे और कॉयर अपशिष्ट को एक सफल उद्यम में बदल दिया। उन्होंने धवलेश्वरम स्थित कॉयर बोर्ड प्रशिक्षण केंद्र में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया और वर्ष 2024-25 में 10 लाख रुपये की परियोजना लागत से एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स की स्थापना की। इसके लिए उन्हें 6.50 लाख रुपये का बैंक ऋण और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम – (पीएमईजीपी) के तहत सहायता प्राप्त हुई। यह इकाई अब पर्यावरण-अनुकूल दरवाजे की चटाइयां, रस्सियां, सजावटी गुड़िया और हस्तशिल्प उत्पादन तैयार करती है।
इस उद्यम ने लगभग 35 लाख रुपये का वार्षिक कारोबार और लगभग 10 लाख रुपये का लाभ अर्जित किया है तथा छह महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान किया है। लेकिन उनका प्रभाव केवल उनके अपने उद्यम तक सीमित नहीं है। उन्होंने लगभग 120 महिलाओं को कॉयर चटाई बुनाई, रस्सी बनाने और हस्तशिल्प उत्पादन का प्रशिक्षण दिया है, जिससे उन्हें आजीविका के अवसर विकसित करने में सहायता मिली है। उनकी सफलता से आसपास के क्षेत्रों में लगभग 5 अतिरिक्त कॉयर इकाइयां स्थापित करने की प्रेरणा भी मिली, जिन्हें प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के माध्यम से सफलता प्राप्त हुई।
2. श्री सुरेंद्रन की हरित कॉयर सफलता की कहानी
