प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, वर्ष 2014 से भारत के कोयला क्षेत्र में व्यापक कायापलट हुई है। यह परिवर्तन भारत सरकार द्वारा पारदर्शिता, दक्षता, प्रौद्योगिकी को अपनाने, बुनियादी ढांचे के विकास, परिचालन में सुगमता और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाने के उद्देश्य से किए गए अनेक नीतिगत और संरचनात्मक सुधारों से प्रेरित है। इन सुधारों के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है, खदानों की योजना को आधुनिक बनाया गया है, कोयला निकासी के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया गया है और पूरे क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाई गई है। इसके परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष 1 बिलियन टन (बीटी) के महत्वपूर्ण आंकड़े को पार कर 1.04 बिलियन टन (अनंतिम) तक पहुंच गया। कोयला देश के लगभग 73 प्रतिशत बिजली उत्पादन के लिए काम में आता है और इस प्रकार देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल), जो कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की एक मिनी रत्न मातहत कंपनी है और छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के कोयला क्षेत्रों में कार्यरत है, इस राष्ट्रीय उपलब्धि के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक रही है। वित्त वर्ष 1985-86 में अपनी स्थापना के वर्ष केवल 34.2 मिलियन टन (एमटी) कोयला उत्पादन करने वाली एसईसीएल ने स्वयं को एक प्रमुख कोयला उत्पादक कंपनी के रूप में परिवर्तित करते हुए वित्त वर्ष 2025-26 में 176.28 मिलियन टन कोयला उत्पादन का आंकड़ा हासिल किया है। वित्त वर्ष 2025-26 में एसईसीएल ने सीआईएल के कुल उत्पादन में लगभग 23 प्रतिशत और भारत के कुल कोयला उत्पादन में लगभग 17 प्रतिशत का योगदान दिया। एसईसीएल के परिचालन से 36,000 से अधिक नियमित कर्मचारी और ठेके पर 24,000 कर्मी जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही, परिवहनकर्ताओं, आपूर्तिकर्ताओं और सेवा प्रदाताओं का एक व्यापक इकोसिस्टम भी इससे जुड़ा हुआ है।
उत्पादन क्षमता बढ़ाकर आपूर्ति सुनिश्चित करना
एसईसीएल के परिचालन के केन्द्र में कोरबा स्थित गेवरा, कुसमुंडा और दीपका खदानें हैं। संयुक्त रूप से, ये तीनों मेगा खदानें 185 मिलियन टन की क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह क्षेत्र कोयला खनन और बिजली उत्पादन का एक प्रमुख केन्द्र है और इसे अक्सर भारत का पावरहाउस कहा जाता है।
