उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज उपराष्ट्रपति भवन में साप्ताहिक विवेक द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘विश्वसंचार हिंदुत्व का’ का विमोचन किया।
Vice President Shri C. P. Radhakrishnan released the book ‘Vishwasanchar Hindutva Ka’, published by Saptahik Vivek, at Uprashtrapati Bhavan today. The Vice President expressed hope that the book would encourage deeper reflection on Bharat's cultural journey and its engagement… pic.twitter.com/fsNodKfYum
इस अवसर पर बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने 1948 में स्थापित 'साप्ताहिक विवेक' के लंबे इतिहास और महाराष्ट्र के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा सार्वजनिक जीवन में इसके जुड़ाव का उल्लेख किया। उन्होंने भारत की संस्कृति, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों और महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों पर पुस्तकें तथा शोध-आधारित साहित्य प्रकाशित करने की इसकी परंपरा की सराहना की।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस पुस्तक का प्रकाशन ऐसे सही समय पर हुआ है, जब 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 100 वर्ष पूरे कर चुका है।
उन्होंने कहा, "संघ से मेरा नाता बहुत पुराना रहा है, इसलिए इस किताब के विमोचन में शामिल होना मेरे लिए बेहद गर्व और सम्मान की बात है।"
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आरएसएस की स्थापना सांस्कृतिक हिंदुत्व के पुनरुत्थान के उद्देश्य से की गई थी और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने हिंदुत्व और संघ के बीच के अटूट संबंध पर जोर दिया था।
उन्होंने कहा कि यह शताब्दी वर्ष एक ऐसा अवसर है, जब एक लंबे समय से विकसित हुए इस संगठन के इतिहास, विचारों और कार्यपद्धति पर चिंतन किया जाए। उन्होंने कहा कि संघ की कार्यपद्धति समय की कसौटी पर खरी उतरी है, जिससे यह सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति के साथ एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में स्थापित हुआ है।
हिंदुत्व के समावेशी स्वरूप पर जोर देते हुए श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा, "हिंदुत्व किसी के खिलाफ नहीं है। हिंदुत्व किसी का विरोधी हो भी नहीं सकता। यह सबको साथ लेकर चलता है।"
उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक हिंदुत्व मूल मूल्यों, सांस्कृतिक आदर्शों, सच्चे मानवीय संबंधों और सार्वभौमिक कल्याण के आदर्श का एक सुंदर संगम है।
उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि "हिंदुत्व" शब्द ने अलग-अलग ऐतिहासिक और बौद्धिक संदर्भों में भिन्न-भिन्न अर्थ ग्रहण किए हैं, और राजनीतिक विचारकों, विद्वानों, संगठनों तथा आलोचकों द्वारा इसकी अलग-अलग व्याख्याएं की गई हैं। उन्होंने कहा कि इसलिए इस विषय को गहराई से समझने के लिए इसके ऐतिहासिक विकास, दार्शनिक पहलुओं और इसके इर्द-गिर्द मौजूद विभिन्न दृष्टिकोणों को समझना आवश्यक है।
