उत्तराखंड के पिथौरागढ़ कलेक्टरेट में शीतजल मत्स्य पालन समूह की प्रगति और भविष्य की जरूरतों पर समीक्षा बैठक हुई। इसकी अध्यक्षता केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने की। ऑनलाइन और प्रत्यक्ष दोनों माध्यमों से हुई बैठक में आईटीबीपी के अपर महानिदेशक संजय कुमार गुंज्याल, विभाग की संयुक्त सचिव गुंजन कृष्णा, आईसीएआर के उप महानिदेशक जे.के. जेना, एनएफबीडी के मुख्य कार्यकारी बी.के. बेहेरा, एमपेडा अध्यक्ष पी. जवाहर, जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगाँई और उत्तराखंड के मत्स्य निदेशक चंद्र सिंह धर्मशक्तू शामिल रहे। अन्य हिमालयी राज्यों, नाबार्ड, आईसीएआर की शीतजल मत्स्य शोध इकाई, खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय तथा मत्स्य पालकों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया।
डॉ. लिखी ने कहा कि हिमालय के ठंडे जल और पर्यावरणीय परिस्थितियां रेनबो ट्राउट पालन के अनुकूल हैं। केंद्र सरकार देश में 34 मत्स्य समूह अधिसूचित कर चुकी है, जिनमें पिथौरागढ़ का शीतजल मत्स्य पालन क्लस्टर शामिल है।
जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगाँई ने स्थानीय मत्स्य पालन की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि ट्राउट उत्पादों का मूल्य संवर्धन, खरीदारों से बेहतर संपर्क और पालकों को उचित कीमत दिलाना आवश्यक है। जिला प्रशासन ने इन चुनौतियों पर केंद्रीय विभाग के साथ मिलकर काम करने का भरोसा दिलाया।
राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड के सीईओ डॉ. बी.के. बेहेरा ने क्लस्टर की स्थिति बताते हुए उत्पादन से पहले और बाद की व्यवस्था में मौजूद कमियों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने आने वाले पांच वर्षों के लिए प्रस्तावित विकास दिशा भी रखी।
संयुक्त सचिव गुंजन कृष्णा ने शीतजल मत्स्य पालन को आगे बढ़ाने के लिए संस्थाओं के बीच तालमेल तथा तकनीकी समाधानों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने प्रसंस्करण, वितरण और मूल्य श्रृंखला से जुड़ी सुविधाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. लिखी ने हिमालयी राज्यों को आईटीबीपी और अन्य सशस्त्र बलों तक ट्राउट की आपूर्ति के लिए समझौते तलाशने का सुझाव दिया। आईटीबीपी के अपर महानिदेशक संजय कुमार गुंज्याल ने बताया कि सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में बल को ट्राउट की पर्याप्त आवश्यकता रहती है।
बैठक में ट्राउट किसानों ने बेहतर बिक्री मूल्य, प्रशिक्षण और उचित दर पर गुणवत्तापूर्ण चारे की मांग रखी। महिला उद्यमी रेखा जोशी ने फिश बॉल्स, फिश फिंगर्स और फिश मोमोज जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने का अनुभव बताया, जिनसे लगभग 5,000 रुपये की रोजाना बिक्री हो रही है। मुनस्यारी के एक पालक ने कहा कि चारा और परिवहन खर्च अधिक होने पर आईटीबीपी को दी जाने वाली ट्राउट की कीमत कम पड़ती है।
भविष्य की योजना पर बातचीत में मछली बीज, चारे, उत्पादन क्षमता और कोल्ड स्टोरेज की उपलब्धता प्रमुख विषय रहे। वैज्ञानिक मार्गदर्शन, बाजार पहुंच और संपूर्ण मत्स्य मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की भी जरूरत बताई गई। सचिव ने राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड से उत्पादन के पहले, दौरान और बाद के चरणों की जरूरतों के अनुरूप विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत करने को कहा।
सचिव ने ट्राउट व्यवसाय में स्टार्टअप और उद्यमियों की अधिक भागीदारी पर जोर दिया। परिवहन तथा निर्यात के लिए हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों के पास शीत भंडारण सुविधाएं उपयोगी हो सकती हैं। उन्होंने सहकारी आधार पर विकास और आईटीबीपी समेत सुरक्षा बलों के साथ समझौते बढ़ाकर दूसरे हिमालयी राज्यों से ट्राउट खरीद को प्रोत्साहित करने का भी सुझाव दिया।
एमपेडा अध्यक्ष पी. जवाहर ने किसानों के तकनीकी प्रशिक्षण, प्रसंस्करण तथा कटाई के बाद प्रबंधन पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार गुणवत्ता नियंत्रण और मूल्य संवर्धन के बेहतर तरीकों से ट्राउट की प्रतिस्पर्धा क्षमता और घरेलू तथा विदेशी बाजारों तक पहुंच मजबूत हो सकती है।
आईसीएआर के उप महानिदेशक जे.के. जेना ने बताया कि संस्थान ट्राउट क्लस्टर के विकास में अनुसंधान और तकनीकी सहायता दे रहा है। प्रयासों में वैज्ञानिक मछली पालन, स्थानीय विशेषज्ञता का विकास और शीतजल मत्स्य पालन को टिकाऊ बनाना शामिल है।
पीके/केसी/आरटी/एकेवी/एसके
