पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने ग्रामीण जल सेवाओं की स्थिरता पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ चौथा वर्चुअल परामर्श आयोजित किया। यह बैठक 1-2 सितंबर 2026 को हुए विभागीय जल शिखर सम्मेलन 2026 की अगली कड़ी थी। चर्चा में जल जीवन मिशन 2.0 और 16वें वित्त आयोग के संसाधनों को पंचायत के नेतृत्व वाली योजना से जोड़ने पर जोर रहा।
सम्मेलन में राज्यों के लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी और ग्रामीण जल आपूर्ति विभागों, पंचायती राज विभागों तथा संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों के अधिकारी शामिल हुए। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने भी भाग लिया। कर्नाटक, ओडिशा और मध्य प्रदेश ने अनुदानों के उपयोग, रखरखाव, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय प्रशासन से जुड़े अनुभव साझा किए। इन उदाहरणों के जरिए चर्चा हुई कि वित्तीय संसाधनों को नियमित सेवा की जरूरतों तक कैसे पहुंचाया जाए।
विभाग के सचिव अशोक के. के. मीणा ने कहा कि जेजेएम 2.0 के विस्तार के साथ ध्यान बने हुए ढांचे की कार्यक्षमता, गुणवत्ता और स्थिरता पर होना चाहिए। उन्होंने सफलता को केवल निर्माण की मात्रा से मापने के बजाय ग्रामीण परिवारों तक सुरक्षित और भरोसेमंद पानी की निरंतर आपूर्ति से जोड़ने को कहा। इसके लिए देखभाल की व्यवस्था और खर्च पूरा करने वाले स्थायी वित्तीय साधन साथ विकसित करने होंगे।
मीणा ने 73वें संवैधानिक संशोधन का उल्लेख करते हुए पेयजल और स्वच्छता में स्थानीय स्वशासन की भूमिका रेखांकित की। उन्होंने ग्राम पंचायतों से वार्षिक संचालन एवं रखरखाव योजना बनाने, स्थानीय संसाधन जुटाने और सेवा वितरण की जवाबदेही संभालने का आग्रह किया। जल जीवन मिशन तथा अन्य योजनाओं से बनी परिसंपत्तियों के प्रबंधन में पंचायतों का नेतृत्व और उनकी स्पष्ट जिम्मेदारी प्रमुख विषय रहे।
सचिव ने 16वें वित्त आयोग के बंधित अनुदानों को जमीनी स्तर पर सेवाएं मजबूत करने का अवसर बताया। उन्होंने कहा कि 16वें वित्त आयोग की ग्रामीण स्थानीय निकाय सहायता का बड़ा हिस्सा जल और स्वच्छता के लिए है। जहां पहले से बने ढांचे को देखभाल चाहिए, वहां उसके संचालन, स्रोत की सुरक्षा, पानी की गुणवत्ता और स्थानीय संस्थागत क्षमता पर खर्च को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
वित्तपोषण की चर्चा में अनुदानों का प्रभावी उपयोग, अन्य सरकारी कार्यक्रमों से संसाधन जोड़ना और उपयोगकर्ता शुल्क संग्रह को धीरे-धीरे मजबूत करना प्रमुख आधार बताए गए। इन उपायों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा गया। उद्देश्य नियमित संचालन के खर्च के लिए योजनाबद्ध व्यवस्था बनाना है, ताकि सेवा किसी एक वित्तीय स्रोत पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध संसाधनों के समन्वय से चल सके।
उन्होंने राज्यों तथा पंचायतों को टिकाऊ राजस्व मॉडल अपनाने और सफल अनुभवों से सीखने को कहा। निर्बाध सेवा के लिए आवश्यक मरम्मत, पाइप रिसाव, पंपों की देखभाल, क्लोरीनीकरण, पानी की जांच, बिजली और कर्मचारियों के खर्च की योजना बननी चाहिए। स्वच्छता और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में बढ़ती भूमिका को देखते हुए स्थानीय निकायों को पानी तथा स्वच्छता की जरूरतों का व्यापक आकलन करने का सुझाव दिया गया।
स्थानीय क्षमता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान तथा अन्य योजनाओं के संसाधन इस्तेमाल करने पर जोर दिया गया। पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मचारियों को वित्त आयोग के तहत अनुमत कार्यों, खर्च की प्रक्रिया और रिपोर्टिंग की जानकारी मिलनी चाहिए। संचालन एवं रखरखाव पुस्तिकाओं का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद और वितरण करने को भी कहा गया, जिससे तकनीकी निर्देश स्थानीय स्तर पर समझे और लागू किए जा सकें।
मीणा ने ग्रामीण जल आपूर्ति, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभागों के बीच राज्य से ग्राम पंचायत तक समन्वय बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने जेजेएम 2.0, वीबी-जी रैम जी और 16वें वित्त आयोग चक्र को साथ लागू होने का अवसर बताया। एकीकृत योजना से वित्तीय प्रावधान, काम की जिम्मेदारी और सेवा की निगरानी को आपस में बेहतर ढंग से जोड़ने पर चर्चा हुई।
एनजेजेएम की उप सचिव कृतिका कुलहारी ने 16वें वित्त आयोग के अनुदान ढांचे, राशि जारी करने की शर्तों, अनुमत कामों और रिपोर्टिंग पर प्रस्तुति दी। इसमें बताया गया कि 16वें वित्त आयोग के अंतर्गत ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए कुल आवंटन 4.35 लाख करोड़ रुपये से अधिक है और करीब 1.74 लाख करोड़ रुपये जल प्रबंधन तथा स्वच्छता के लिए हैं। मौजूदा परिसंपत्तियों, निवारक रखरखाव और सामुदायिक स्वामित्व को प्राथमिकता दी गई।
पंचायती राज मंत्रालय के निदेशक विपुल उज्ज्वल ने जरूरतों, संसाधनों और जिम्मेदारियों को साथ समझना आवश्यक बताया। उनके अनुसार पंचायत पहले सेवा की कमी पहचाने, फिर वार्षिक रखरखाव लागत और उपलब्ध धन का आकलन करे तथा इसे ग्राम पंचायत विकास योजना में शामिल करे। स्वयं के राजस्व, उपयोगकर्ता शुल्क और प्रदर्शन आधारित अनुदान पंचायत की वित्तीय क्षमता मजबूत करने के साधनों के रूप में प्रस्तुत किए गए।
राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने ई-ग्रामस्वराज की रिपोर्टिंग व्यवस्था समझाई। डिजिटल मंच पर योजना, क्रियान्वयन, जियो-टैगिंग, खर्च, परिसंपत्ति अभिलेख और निगरानी को जोड़ने की जानकारी दी गई। सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली और विभागीय डेटाबेस के साथ एकीकरण पर भी चर्चा हुई। इसका उद्देश्य वित्त आयोग से सहायता प्राप्त गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाना तथा पंचायत और विभागों को काम और व्यय की स्थिति का नियमित आकलन करने में मदद देना है।
कर्नाटक ने जल संकलन, जला आस्थी और जीवजला के माध्यम से जल आपूर्ति प्रबंधन का अपना अनुभव रखा। इनमें जीआईएस आधारित परिसंपत्ति अभिलेख, निगरानी, समुदाय की भागीदारी और आंकड़ों पर आधारित रखरखाव योजना शामिल हैं। राज्य ने जल बजट, मात्रा के आधार पर शुल्क और निवारक देखभाल पर भी चर्चा की। उसका कहना था कि ग्रामीण विकास, पंचायत और जल विभागों का साथ काम करना, जिम्मेदारियां स्पष्ट होना और समुदाय से निरंतर संपर्क स्थानीय सेवाओं की स्थिरता में मदद करते हैं।
ओडिशा ने ग्रामीण विकास, पंचायती राज और पेयजल विभागों के समन्वय वाला मॉडल प्रस्तुत किया। स्थानीय जरूरतों से बजट बनाना, मैकेनिकों को प्रशिक्षण, डिजिटल निगरानी, सौर ऊर्जा और स्वचालन इसके प्रमुख उदाहरण रहे। राज्य ने वित्त आयोग अनुदान, अपने संसाधन और सामुदायिक योगदान को साथ इस्तेमाल करने का अनुभव बताया। ग्राम पंचायत की भागीदारी, तकनीकी क्षमता और स्पष्ट जवाबदेही को भरोसेमंद जल आपूर्ति तथा परिसंपत्तियों की लंबी अवधि की देखभाल से जोड़ा गया।
मध्य प्रदेश ने संचालन एवं रखरखाव नियम 2026 और जल-स्वच्छता के लिए अलग-अलग निधि स्रोतों के उपयोग की जानकारी दी। राज्य ने खरीद प्रक्रिया सरल करने, जिला स्तर की डब्ल्यूएएसएच तकनीकी समितियों, प्रशिक्षण और डिजिटल शुल्क संग्रह का उल्लेख किया। पंचायत प्रतिनिधियों तथा इंजीनियरों की तकनीकी तैयारी पर भी जोर रहा। वित्त आयोग सहायता, राज्य अनुदान, शुल्क तथा अन्य स्थानीय आय को नियमित संचालन की वित्तीय योजना में साथ रखने का अनुभव साझा किया गया।
समापन में एनजेजेएम के अपर सचिव और मिशन निदेशक कमल किशोर सोआन ने पंचायतों के स्वामित्व तथा स्थायी जल प्रशासन को मजबूत करने को कहा। राज्यों से लंबित अनुपालन पूरा करने, ग्राम पंचायत विकास योजना के आधार पर काम तय करने और शुल्क संग्रह सुधारने का आग्रह किया गया। उन्होंने 15वें तथा 16वें वित्त आयोग के संसाधनों का उपयोग बनी हुई ग्रामीण जल अवसंरचना को चलाते रहने के लिए प्रभावी तरीके से करने पर जोर दिया।
सोआन ने पंचायत प्रतिनिधियों, सचिवों, सरपंचों और तकनीकी कर्मियों के प्रशिक्षण की जरूरत दोहराई। ई-ग्रामस्वराज पर लॉगिन और रिपोर्टिंग में आने वाली समस्याएं समय पर हल करने को कहा गया। नवंबर 2026 में प्रस्तावित क्षेत्रीय सम्मेलनों के जरिए तैयारी और क्रियान्वयन की चुनौतियों की समीक्षा की जाएगी। इन बैठकों का उद्देश्य पेयजल, स्वच्छता, पंचायत और ग्रामीण विकास के जिम्मेदार विभागों के बीच तालमेल बेहतर करना है।
बैठक में केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने पंचायत आधारित योजना, टिकाऊ वित्तीय व्यवस्था और विभागीय सहयोग बढ़ाने की साझा प्रतिबद्धता जताई। चर्चा का मुख्य प्रश्न था कि अब तक हुए निवेश से ग्रामीण परिवारों को लगातार सुरक्षित पानी और स्वच्छता सेवाएं कैसे मिलें। इसके लिए स्थानीय भागीदारी, स्पष्ट जिम्मेदारियों, नियमित रखरखाव और भरोसेमंद सेवा पर केंद्रित प्रबंधन को आगे बढ़ाने पर सहमति रही।
सम्मेलन में साझा अनुभवों और तकनीकी प्रस्तुतियों का उद्देश्य ग्रामीण जल व्यवस्थाओं की संचालन क्षमता तथा जवाबदेही मजबूत करना रहा।
