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भारत में रामसर स्थल

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Date25 October 2026 (Sunday)
Time9:43 AM
Topic / MinistryPIB Backgrounder
Languageहिन्दी · Read in English
Reading time11 min (2,013 words)

रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत अंतर्राष्‍ट्रीय महत्‍व की आर्द्रभूमियों के भारत के नेटवर्क का विस्तार वर्ष 2014 से अब तक लगभग चार गुना हो चुका है। नामित स्‍थलों की संख्या 26 से बढ़कर 103 तक पहुँच गई है, जो 13.87 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए हैं। एशिया में प्रथम और विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर स्थित ये इकोसिस्‍टम जैव विविधता के संरक्षण, बाढ़ के प्रभाव को कम करने, भूजल पुनर्भरण तथा आजीविका को बनाए रखने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन ) नियम, 2017 के आधार पर भारत सरकार जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय योजना (एनपीसीए), अमृत धरोहर, मिष्टी,और मिशन सहभागिता के माध्यम से वैज्ञानिक एवं जनभागीदारी आधारित संरक्षण को बढ़ावा दे रही है, ताकि दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुदृढ़ता सुनिश्चित की जा सके।

भारत में रामसर स्थल — एक नज़र

रामसर कन्वेंशन के अनुसार, “आर्द्रभूमियाँ दलदल, दलदली भूमि, पीटभूमि या जल वाले ऐसे क्षेत्र हैं, चाहे वे प्राकृतिक हों या कृत्रिम, स्थायी हों या अस्थायी, जिनमें स्थिर या प्रवाहित, मीठा, खारा या लवणीय जल पाया जाता है। इसमें समुद्री जल के वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जहाँ निम्न ज्वार के समय जल की गहराई छह मीटर से अधिक नहीं होती।” भूमि और जल को जोड़ने वाली आर्द्रभूमियाँ मीठे जल का भंडारण करती हैं, भूजल का पुनर्भरण करती हैं, बाढ़ के प्रभाव को कम करती हैं तथा मत्स्य पालन और कृषि को बनाए रखती हैं। ये प्रवासी पक्षियों और समृद्ध जैव विविधता को भी आश्रय प्रदान करती हैं, जिससे ये पृथ्वी के सर्वाधिक उत्पादक इकोसिस्‍टमों में शामिल हैं।

वैश्विक स्तर पर इन प्राकृतिक पर्यावासों का संरक्षण आर्द्रभूमि कन्वेंशन अथवा रामसर कन्वेंशन नामक अंतर-सरकारी संधि के अंतर्गत किया जाता है। इसे 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में स्‍वीकृत किया गया था और इसे वर्ष 1975 में लागू किया गया। अक्टूबर 2026 तक, इसमें 172 संविदाकारी पक्ष शामिल हैं तथा इसके अंतर्गत विश्वभर में 2,536 से अधिक स्थल “रामसर स्थल” के रूप में नामित किए जा चुके हैं।

भारत, जहाँ बड़ी संख्या में आर्द्रभूमियाँ मौजूद हैं, 1 फरवरी 1982 को इस कन्वेंशन का पक्षकार बना। तब से देश में रामसर स्थलों के नेटवर्क का निरंतर विस्तार हुआ है। वर्तमान में भारत में 103 रामसर स्थल हैं, जो कि वर्ष 2014 में मात्र 26 स्थलों की तुलना में लगभग चार गुना वृद्धि दर्शाते हैं। स्थलों की संख्या के आधार पर भारत का नेटवर्क एशिया में प्रथम और विश्व में तीसरे स्थान पर है। कुल मिलाकर ये स्थल 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13.87 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैले हुए हैं।

रामसर स्थलों को समझना

रामसर स्थल ऐसी आर्द्रभूमि होती है, जिसे रामसर कन्वेंशन के अंतर्गत अंतर्राष्‍ट्रीय महत्‍व की आर्द्रभूमि के रूप में नामित किया गया है। इन स्थलों को उनके पारिस्थितिक, वनस्पति-विज्ञान संबंधी, प्राणी-विज्ञान संबंधी, लिम्नोलॉजिकल अथवा जलविज्ञान संबंधी महत्‍व के लिए मान्यता प्रदान की जाती है। रामसर कन्वेंशन के तीन प्रमुख स्तंभ हैं। ये हैं—सभी आर्द्रभूमियों का विवेकपूर्ण उपयोग, रामसर स्थलों का नामांकन एवं उनका प्रभावी प्रबंधन, तथा आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग।

किसी आर्द्रभूमि को कैसे नामित किया जाता है

भारत में इस प्रक्रिया की शुरुआत राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन द्वारा उपयुक्त आर्द्रभूमि की पहचान करने से होती है। इसके बाद, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय नामांकन के अनुमोदन की प्रक्रिया का समन्वय करता है और प्रस्ताव को रामसर सचिवालय के पास भेजता है।

रामसर स्थल के रूप में घोषित किए जाने के मानदंड

किसी आर्द्रभूमि को अंतर्राष्‍ट्रीय महत्‍व की आर्द्रभूमि के रूप में अर्हता प्राप्त करने के लिए निर्धारित नौ मानदंडों में से कम से कम एक को पूरा करना आवश्यक है। ये मानदंड दो समूहों में विभाजित हैं, जिनमें आर्द्रभूमि के प्रकार तथा जैव विविधता का संरक्षण शामिल हैं।

आर्द्रभूमि को अंतर्राष्ट्रीय महत्‍व की माना जाना चाहिए

समूह क: आर्द्रभूमि के प्रकार

यदि इसमें संबंधित जैव-भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले किसी प्राकृतिक या लगभग प्राकृतिक आर्द्रभूमि प्रकार का प्रतिनिधि, दुर्लभ या अद्वितीय उदाहरण मौजूद हो।

समूह ख : जैव विविधता

प्रजातियों और पारिस्थितिक समुदायों पर आधारित मानदंड

यदि यह असुरक्षित, संकटग्रस्त या अतिसंकटग्रस्त प्रजातियों अथवा संकटापन्न पारिस्थितिक समुदायों को आश्रय प्रदान करती हो।

यदि यह किसी विशिष्ट जैव-भौगोलिक क्षेत्र की जैव विविधता को बनाए रखने के लिए महत्‍वपूर्ण पादप और/या जंतु प्रजातियों की आबादी को आश्रय प्रदान करती हो।

यदि यह पादप और/या जंतु प्रजातियों को उनके जीवन-चक्र के किसी महत्‍वपूर्ण चरण में आश्रय प्रदान करती हो अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों के दौरान उन्हें शरणस्थली उपलब्ध कराती हो।

जलपक्षियों पर आधारित विशिष्ट मानदंड

यदि यह नियमित रूप से 20,000 या उससे अधिक जलपक्षियों को आश्रय प्रदान करती हो।

यदि यह किसी जलपक्षी प्रजाति या उसकी उप-प्रजाति की आबादी के 1% को नियमित रूप से आश्रय प्रदान करती हो।

मछलियों पर आधारित विशिष्ट मानदंड

यदि यह स्थानिक मछली उप-प्रजातियों, प्रजातियों या कुलों, जीवन-चक्र के विभिन्न चरणों, प्रजातियों के बीच पारस्परिक संबंधों और/या ऐसी आबादियों के एक महत्‍वपूर्ण अनुपात को आश्रय प्रदान करती हो, जो आर्द्रभूमियों से प्राप्त होने वाले लाभों और/या उनके महत्‍व को दर्शाती हो तथा इस प्रकार वैश्विक जैव विविधता में योगदान देती हो।

यदि यह मछलियों के लिए भोजन का एक महत्‍वपूर्ण स्रोत, प्रजनन स्थल, शिशु मछलियों के पालन-पोषण का क्षेत्र और/या प्रवास मार्ग हो, जिस पर मछलियों के भंडार (चाहे आर्द्रभूमि के भीतर हों या अन्यत्र) निर्भर करते हो।

अन्य टैक्‍सा या वर्गकों पर आधारित विशिष्ट मानदंड

यदि यह आर्द्रभूमि पर निर्भर किसी गैर-पक्षी जंतु प्रजातियों की एक प्रजाति या उसकी उप-प्रजाति की आबादी के 1% को नियमित रूप से आश्रय प्रदान करती हो।

क्या आप जानते हैं?

टैक्सॉन ऐसे जीवों का एक समूह है, जिन्हें उनकी समान विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जबकि टैक्सा इसका बहुवचन रूप है, जो ऐसे अनेक समूहों को संदर्भित करता है। उदाहरण के लिए, गुलाब जैसे पुष्पीय पौधे पादप टैक्सॉन का हिस्सा हैं, जबकि तितलियाँ कीट टैक्सॉन के अंतर्गत आती हैं। जैव विविधता में उभयचर, सरीसृप और स्तनधारी प्रमुख जैविक वर्गीकरण समूहों के उदाहरण हैं।

आर्द्रभूमियों को रामसर सूची में शामिल करने के लाभ

रामसर सूची में आर्द्रभूमियों को शामिल करना और रामसर कन्वेंशन के प्रति प्रतिबद्धताओं को पूरा करना, जैव विविधता संरक्षण के वैश्विक प्रयासों की दिशा में महत्‍वपूर्ण योगदान देना है। रामसर स्थलों को न केवल किसी देश, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए महत्‍वपूर्ण माना जाता है। रामसर स्थलों को नामित करने तथा उनका संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिनिधित्व के लिए मंच प्रदान करता है: इससे देशों को आर्द्रभूमियों के संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित प्रमुख अंतर-सरकारी मंच पर अपनी चिंताएँ और विचार प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। जिम्बाब्वे के विक्टोरिया फॉल्स में आयोजित रामसर पक्षकारों के 15वें सम्मेलन में भारत ने ‘आर्द्रभूमियों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए सतत जीवनशैली को बढ़ावा देना’ विषय पर एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। सम्मेलन में इस प्रस्ताव को पारित किया गया। इसे रामसर कन्वेंशन के 172 पक्षकारों, छह अंतर्राष्‍ट्रीय संगठन साझेदारों और अन्य पर्यवेक्षकों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

दृश्यता और पहचान बढ़ाता है: इससे रामसर स्थलों की अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर दृश्यता और पहचान बढ़ती है, जिससे उनके संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग के लिए समर्थन मजबूत हो सकता है।

अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों और मार्गदर्शन तक पहुँच प्रदान करता है: अंतर्राष्‍ट्रीय महत्‍व की आर्द्रभूमियों की पहचान के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत मानकों से संबंधित नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराता है। साथ ही, आर्द्रभूमियों के विवेकपूर्ण उपयोग और उनके प्रबंधन की योजना बनाने के लिए मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।

विशेषज्ञ सहायता प्राप्त करने में सहायक होता है: इससे राष्ट्रीय और स्थल-विशिष्ट स्तर पर आर्द्रभूमियों के संरक्षण एवं प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए विशेषज्ञ सलाह प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह सहायता आवश्यकता के अनुसार, रामसर सचिवालय, उसके सहयोगियों और रामसर सलाहकार मिशनों के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है।

अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग और वित्तीय सहायता को बढ़ावा देता है: आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए सहयोग को बढ़ावा देता है। साथ ही, कन्वेंशन की लघु-अनुदान योजनाओं तथा बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वित्तपोषण एजेंसियों के साथ संपर्क के माध्यम से परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने में भी मदद मिल सकती है।

नामांकन के बाद की प्रतिबद्धताएँ

नामांकन संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश सरकार को उस आर्द्रभूमि और उसके संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध करता है। ऐसे स्थल को आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के अंतर्गत अधिसूचित माना जाता है। साथ ही, दिशा-निर्देशों में एकीकृत प्रबंधन योजना के साथ इन नियमों के तहत औपचारिक अधिसूचना जारी करने की भी सिफारिश की गई है।रामसर सूचना पत्रक को प्रत्येक छह वर्ष में अद्यतन करना आवश्यक है तथा स्थल की पारिस्थितिक विशेषताओं की नियमित निगरानी की जानी चाहिए। इन मानदंडों और प्रतिबद्धताओं के मार्गदर्शन के लिए भारत ने रामसर स्थलों का व्यापक और उल्लेखनीय रूप से विविधतापूर्ण नेटवर्क विकसित किया है।

भारत के रामसर स्थल — 26 से 103 तक

भारत के रामसर स्थल ऊँचाई पर स्थित झीलों, नदी के बाढ़ मैदानों, मैंग्रोव वनों, प्रवाल भित्तियों, गाँवों के तालाबों और शहरी दलदली क्षेत्रों तक फैले हैं। तमिलनाडु में सर्वाधिक 20 स्थल हैं, जबकि उत्तर प्रदेश 14 स्थलों के साथ दूसरे स्थान पर है। इन स्थलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, अकेले वर्ष 2025 में 11 आर्द्रभूमियों को रामसर सूची में शामिल किया गया, जिससे देश में इनकी कुल संख्या 96 हो गई। उत्तर प्रदेश स्थित सुरहा ताल जून 2026 में भारत का 100वाँ स्थल, जबकि अगस्त में ग्लॉ झील को 101वें स्थल के रूप में शामिल किया गया। चंडीगढ़ की सुखना आर्द्रभूमि और उत्तर प्रदेश की सौज झील को सूची में नवीनतम स्थलों के रूप में शामिल किए जाने के साथ ही 15अक्टूबर 2026 तक, भारत में रामसर स्थलों की कुल संख्या बढ़कर 103 हो गई।

भारत के प्रथम रामसर स्थल

ओडिशा की चिल्‍का झील और राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को 1 अक्टूबर 1981 को भारत के प्रथम रामसर स्थलों के रूप में नामित किया गया था। सफल पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के बाद, चिल्‍का झील को वर्ष 2002 में मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड से हटा दिया गया। बाद में, चिल्‍का विकास प्राधिकरण को रामसर आर्द्रभूमि संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड क्या है:मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड रामसर स्थलों का एक ऐसा रजिस्टर है, जिसमें उन स्थलों को शामिल किया जाता है, जहाँ पारिस्थितिक विशेषताओं में परिवर्तन हो चुका है, हो रहा है या होने की आशंका है। यह उन आर्द्रभूमियों की पहचान करता है, जिन्हें संरक्षण के लिए प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है, तथा उनकी निगरानी, सुधारात्मक उपायों और संसाधनों के आवंटन के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। किसी स्थल को संबंधित देश और प्रासंगिक वैज्ञानिक विशेषज्ञों के परामर्श से इस रिकॉर्ड में शामिल किया जाता है। सफल सुधारात्मक उपायों का दस्तावेजीकरण हो जाने या पारिस्थितिक परिवर्तन का खतरा समाप्त हो जाने पर उस स्थल को मॉन्ट्रेक्स रिकॉर्ड से हटाया जा सकता है।

भारत की रामसर स्थलों की सूची में हाल ही में शामिल किए गए स्थल

सुखना आर्द्रभूमि (चंडीगढ़) शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में वर्ष 1958 में बनाया गया एक मानव-निर्मित जलाशय है। यह पलास फिश ईगल, कॉमन पोचार्ड और ब्लैक पोंड टर्टल जैसी लुप्‍तप्राय प्रजातियों को आश्रय प्रदान करता है। मध्य एशियाई फ्लाईवे से होकर आने वाले प्रवासी पक्षी भोजन प्राप्त करने और शीतकाल बिताने के लिए इस आर्द्रभूमि पर निर्भर रहते हैं।

सौज झील (उत्तर प्रदेश) मैनपुरी जिले में स्थित बाढ़ के मैदान की एक उथली झील है, जहाँ 30,000 से अधिक जलीय पक्षी नियमित रूप से आते हैं। यह सारस और वृहद चित्तीदार चील जैसी लुप्‍तप्राय पक्षी प्रजातियों को घोंसले बनाने तथा भोजन की तलाश करने के लिए उपयुक्त आवास प्रदान करती है। इसके पवित्र कमल और जंगली गन्ने के घने क्षेत्र घोंसले बनाने वाले पक्षियों, मछलियों और उभयचरों को आश्रय प्रदान करते हैं।

रामसर स्थलों की राज्यवार सूची

नीचे दी गई तालिका में राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के अनुसार सभी 103 रामसर स्थलों तथा उनके प्रमुख संरक्षण महत्‍व का उल्लेख किया गया है।

राज्य /केंद्रशासित प्रदेश

इसकी क्या विशेषता है

मीठे पानी की झील; ग्रे पेलिकन और प्रवासी जलपक्षी

अरुणाचल प्रदेश

पूर्वी हिमालयी झील; 150 से अधिक वृक्ष और ऑर्किड की 49 प्रजातियाँ।

ब्रह्मपुत्र की बाढ़भूमि वाला आर्द्रभूमि क्षेत्र; प्रवासी जलपक्षी

कंवर झील (काबरताल)

बाढ़भूमि आर्द्रभूमि; प्रवासी जलपक्षी और मछलियाँ

नागी पक्षी अभयारण्य

मानव निर्मित जलाशय; शीतकाल में आने वाले जलपक्षी

नकटी पक्षी अभयारण्य

गंगा की विसर्प झील; पक्षी, मत्स्य पालन और बाढ़ के प्रभाव को कम करने में सहायक

विसर्प झील; शीतकाल में प्रवासी जलपक्षी

विसर्प झील; स्थानीय एवं प्रवासी पक्षी

सुखना आर्द्रभूमि

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