चेन्नई में श्री रामचंद्र उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के दीक्षांत समारोह में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने चिकित्सा के बदलते स्वरूप पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जीनोमिक्स की मदद से अधिक व्यक्तिगत चिकित्सा की संभावनाएं बढ़ रही हैं। उनके अनुसार भारत भी उन्नत स्वास्थ्य समाधानों के विकास में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।
संस्थान के 42वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मंत्री ने युवा चिकित्सकों से तकनीक और अनुभव को साथ लेकर चलने को कहा। उन्होंने बताया कि नई पीढ़ी को बेहतर उपकरण उपलब्ध होंगे, लेकिन उनका सही उपयोग समझना भी उसकी जिम्मेदारी होगी। रोगी की स्थिति समझकर निर्णय लेने और बीमारी रोकने की क्षमता चिकित्सा प्रशिक्षण का प्रमुख हिस्सा बनी रहनी चाहिए।
डॉ. सिंह ने स्नातक, स्नातकोत्तर और सुपर-स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों तथा स्वर्ण पदक विजेताओं को बधाई दी। कुलाधिपति वी. आर. वेंकटचलम और संस्थान के अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधि समारोह में मौजूद थे। मंत्री ने चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में संस्थान के योगदान की सराहना की। उन्होंने अनुपस्थित कुलपति डॉ. उमा के जल्द स्वस्थ होने की कामना भी की।
अपने चिकित्सकीय अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के सामने रोगों का स्वरूप बदल रहा है। संक्रामक बीमारियों की चुनौती बनी हुई है, जबकि मधुमेह और हृदय रोग जैसे दीर्घकालिक विकारों पर भी अधिक ध्यान देना पड़ रहा है। बढ़ती जीवन प्रत्याशा के साथ कम उम्र में बीमारी की शुरुआत स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के लिए नई मांगें पैदा करती है।
मंत्री ने उदाहरण दिया कि 30 वर्ष की उम्र में मधुमेह होने पर व्यक्ति को उसके प्रभावों के साथ लंबे समय तक रहना पड़ सकता है। इसलिए जटिलताएं रोकना और महत्वपूर्ण अंगों की सुरक्षा करना डॉक्टरों, परिवार तथा रोगी की अनिवार्य जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं के स्वास्थ्य को देश की मानव क्षमता और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से जोड़ा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जीन-आधारित चिकित्सा पर उन्होंने कहा कि नई तकनीकें निदान, उपचार और व्यक्तिगत देखभाल की संभावनाएं खोल सकती हैं। चिकित्सकों को उनके उपयोग की सीमाएं तथा उपयोगिता समझते हुए उन्हें अपने काम से जोड़ना होगा। रोगी की देखभाल के लिए आवश्यक नैदानिक समझ को बनाए रखने पर उन्होंने विशेष जोर दिया। तकनीकी क्षमता और चिकित्सकीय विवेक को साथ विकसित करना उनके संबोधन का प्रमुख संदेश रहा।
स्वदेशी अनुसंधान के उदाहरण देते हुए डॉ. सिंह ने कोविड-19 के विरुद्ध डीएनए वैक्सीन और डेंगू तथा मलेरिया से जुड़े वैक्सीन अनुसंधान का उल्लेख किया। उन्होंने हीमोफीलिया के लिए जीन थेरेपी पर हो रहे काम की भी चर्चा की। उनके अनुसार इन क्षेत्रों में भारतीय संस्थानों का योगदान जटिल स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान विकसित करने की बढ़ती क्षमता दिखाता है।
दवा विकास के संदर्भ में उन्होंने सामुदायिक जीवाणु निमोनिया के लिए नेफिथ्रोमाइसिन का उदाहरण दिया। तीव्र लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया और फैटी लिवर से संबंधित परमाणु चिकित्सा अनुसंधान का भी उल्लेख हुआ। मंत्री ने इन्हें वैज्ञानिक और चिकित्सा संस्थानों की शोध क्षमता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। संबोधन का जोर अनुसंधान की दिशा और संभावनाओं पर था।
डॉ. सिंह ने संस्थान को जीनोमिक्स, बायोमैन्युफैक्चरिंग और परमाणु चिकित्सा की राष्ट्रीय अनुसंधान पहलों में भागीदारी बढ़ाने का निमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय, अस्पताल, सरकारी शोध संस्थान और उद्योग साथ काम करें तो वैज्ञानिक विशेषज्ञता को रोगियों की जरूरतों से बेहतर ढंग से जोड़ा जा सकता है। इससे शोध को उपयोगी तथा किफायती स्वास्थ्य समाधानों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
उन्होंने संस्थान को अपने शोध संसाधनों, चिकित्सकीय अनुभव और स्टार्टअप व्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया। नई उपचार पद्धतियों और चिकित्सा तकनीकों के विकास में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों का सहयोग उपयोगी होगा, उन्होंने कहा। शोधकर्ता, डॉक्टर और तकनीक विकसित करने वाले मिलकर काम करें तो नवाचार और वास्तविक स्वास्थ्य जरूरतों के बीच बेहतर संबंध बन सकता है।
जीनोमिक जानकारी के उपयोग पर मंत्री ने कहा कि रोगी की आनुवंशिक विशेषताओं को उसकी जीवनशैली, वातावरण और उपचार के परिणामों के साथ समझना चाहिए। इससे व्यक्ति के अनुसार चिकित्सा तय करने की दिशा में मदद मिल सकती है। उन्होंने वैज्ञानिक ज्ञान को नैदानिक अनुभव के साथ जोड़ने की बात दोहराई, ताकि नई जानकारी रोगी की देखभाल में सार्थक सुधार ला सके।
समापन में डॉ. सिंह ने युवाओं में दीर्घकालिक रोगों की रोकथाम को सामूहिक राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य और उत्पादक क्षमता की रक्षा विकसित भारत 2047 की परिकल्पना के लिए आवश्यक है। इसके लिए निवारक देखभाल, चिकित्सा अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और जिम्मेदार चिकित्सा पद्धतियों पर निरंतर प्रयास करने होंगे।
