चमकीले एक्स-रे पल्सर सेंटॉरस X-3 के अध्ययन में शोधकर्ताओं को ऐसी डिस्क के संकेत मिले हैं जिसके रास्ते पदार्थ तारे तक पहुंचता है। इस तरह की उच्च-द्रव्यमान द्वितारा प्रणाली में डिस्क से पदार्थ ग्रहण करने का निष्कर्ष महत्वपूर्ण माना गया है।
सेंटॉरस X-3 की तीव्र चमक के कारण इसका लंबे समय से अध्ययन होता रहा है। नए निष्कर्ष इसके विकिरण को समझने वाले मॉडलों को बेहतर कर सकते हैं। आसपास की संरचनाओं का पता लगाने की यह विधि दूसरी द्वितारा पल्सर प्रणालियों को समझने में भी उपयोगी हो सकती है।
एक्स-रे द्वितारा प्रणाली में चुंबकीय न्यूट्रॉन तारा और उसका साथी गुरुत्वाकर्षण से जुड़े रहते हैं। न्यूट्रॉन तारा अत्यंत सघन होता है, जिसमें बहुत अधिक द्रव्यमान छोटे आकार में समाया होता है। उसका प्रबल गुरुत्व साथी से निकले पदार्थ को खींचता है। जब यह पदार्थ उसकी ओर बढ़कर एकत्र होता है, तो एक्स-रे उत्पन्न होते हैं। इन्हीं संकेतों के अध्ययन से वैज्ञानिक पदार्थ के रास्ते और निकटवर्ती संरचनाओं का अनुमान लगाते हैं।
सेंटॉरस X-3 पृथ्वी से लगभग 24,000 प्रकाश-वर्ष दूर है। इसके साथी का द्रव्यमान सूर्य से 10 गुना से अधिक है। यह आरंभ में पहचाने गए एक्स-रे पल्सरों में शामिल है और सेंटॉरस तारामंडल में खोजा गया तीसरा एक्स-रे स्रोत था।
पल्सर के चुंबकीय ध्रुवों के पास उत्पन्न प्राथमिक विकिरण उसके घूमने के साथ अलग दिशाओं में पहुंचता है। उपग्रह इसकी किरण अपने सामने आने पर उसे दर्ज करते हैं। आसपास का पदार्थ इस विकिरण को सोखकर फिर उत्सर्जित करता है, जिसे द्वितीयक विकिरण कहा जाता है। ऐसा पदार्थ साथी तारे की सतह या उससे निकली तारकीय पवन जैसी संरचनाओं में हो सकता है। इसकी प्रतिक्रिया समझने से प्रणाली की दिशा, चुंबकीय क्षेत्र और अन्य भौतिक गुणों पर जानकारी मिलती है।
चित्र 1 में सेंटॉरस X-3 प्रणाली की कलाकार द्वारा बनाई कल्पना दिखाई गई है; आकार वास्तविक अनुपात में नहीं हैं।
दूरी अधिक होने से ये प्रणालियां दूरबीन में प्रकाश के छोटे बिंदु जैसी लगती हैं। आसपास के जटिल हिस्सों को सीधे तस्वीर में अलग करके देख पाना कठिन है। इसलिए उनके प्रभाव से बदलते विकिरण को अप्रत्यक्ष संकेत के रूप में उपयोग किया जाता है।
पहले के अध्ययनों ने द्वितीयक उत्सर्जन की तीव्रता में बदलाव को पल्सर के घूर्णन से जोड़ा था। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट में किंजल रॉय की अगुवाई वाली टीम ने चार उत्सर्जन रेखाओं का विस्तृत विश्लेषण किया। उनका उद्देश्य बदलते संकेतों के पीछे की संरचना की पहचान करना था।
टीम ने निष्कर्ष निकाला कि जिम्मेदार संरचना पल्सर के साथ घूम रही है। प्रेक्षणों से मिले संकेतों को जोड़कर रॉय ने इसे अभिवृद्धि प्रवाह के रूप में पहचाना। शोधकर्ताओं की व्याख्या में यह पदार्थ को डिस्क से न्यूट्रॉन तारे की ओर ले जाने वाला रास्ता है।
प्रवाह के इस निष्कर्ष से टीम ने डिस्क की मौजूदगी का अनुमान लगाया। डिस्क में एकत्र पदार्थ आगे प्रवाह के जरिए तारे तक पहुंचता है। इस प्रकार बदलती उत्सर्जन रेखाएं सीधे न दिख सकने वाली पदार्थ-संचय प्रक्रिया की जानकारी देती हैं।
चुंबकीय क्षेत्र पदार्थ को ध्रुवों की ओर निर्देशित करता है। घूमता प्रवाह जब उपग्रह की दृष्टि और पल्सर के बीच आता है, तब सीधे दिखने वाला प्राथमिक विकिरण घटता है। इसी समय प्रवाह से संबंधित द्वितीयक विकिरण बढ़ सकता है। टीम ने इस उलटे बदलाव के आधार पर निकटवर्ती संरचना की भूमिका को समझा।
निष्कर्ष के अनुसार सेंटॉरस X-3 में पदार्थ डिस्क के रास्ते आता है। उच्च-द्रव्यमान प्रणालियों में सामान्य व्याख्या साथी की तारकीय पवन को सीधे ग्रहण करने की है। इसलिए डिस्क से जुड़े संकेत इस स्रोत के लिए अधिक उपयुक्त वैज्ञानिक मॉडल तैयार करने में महत्वपूर्ण हैं।
रॉय ने कहा कि सेंटॉरस X-3 में डिस्क की व्याख्या होने पर विकिरण मॉडलों में बदलाव चाहिए। ऐसी प्रणालियों में सामान्यतः डिस्क की अपेक्षा नहीं की जाती। भविष्य के सेंटॉरस X-3 मॉडल में डिस्क से आने वाले विकिरण का योगदान शामिल करना आवश्यक होगा, ताकि प्रेक्षणों की व्याख्या में इस संरचना की भूमिका भी आए।
चित्र 2 चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के सहारे तारे की ओर बढ़ता अभिवृद्धि प्रवाह दर्शाता है।
शोध प्रकाशन का पहचान क्रमांक: DOI 10.3847/1538-4357/adf8e6।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की शोध संबंधी जानकारी।
