पर्यावरण Read in English

भारत ने आर्मेनिया के येरेवन में सीबीडी सीओपी-17 में जैव विविधता संरक्षण, जैव सुरक्षा तथा पहुंच एवं लाभ साझाकरण पर चार प्रमुख प्रकाशन जारी किए

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DetailInformation
Date28 October 2026 (Wednesday)
Time4:01 PM
Topic / Ministryपर्यावरण
Languageहिन्दी · Read in English
Reading time5 min (851 words)

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने आज आर्मेनिया के येरेवन में जैव विविधता संधि (सीबीडी) के पक्षकारों के 17वें सम्मेलन (कॉप-17) के दौरान वैश्विक जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को प्रभावी कार्यान्वयन, सतत वित्तपोषण और दीर्घकालिक संरक्षण परिणामों में बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस कार्यक्रम का आयोजन केन्‍द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भारत के राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के साथ साझेदारी में किया। इस अवसर पर सीबीडी कॉप-17 के अध्यक्ष एवं आर्मेनिया गणराज्य के पर्यावरण मंत्री श्री हम्बार्जुम मातेवोस्यान तथा सीबीडी सचिवालय की पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (एबीएस) इकाई के प्रमुख डॉ. तौकोंदजो शिकोंगो भी उपस्थित रहे।

‘नीति से व्यवहार तक: नवाचार, वित्तपोषण, पहुंच एवं लाभ-साझाकरण और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (ओईसीएम) के माध्यम से भारत की जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाना’ विषय पर आयोजित इस साइड इवेंट में मुख्य वक्तव्य देते हुए श्री यादव ने कार्यान्वयन क्षमता विकसित करने, वित्तपोषण को निरंतर बनाए रखने तथा यह सुनिश्चित करने के महत्व के बारे में बताया कि जैव विविधता का संरक्षण और सतत उपयोग मानव कल्याण एवं अंतरपीढ़ीगत समानता में योगदान दें। कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा का जिक्र करते हुए श्री यादव ने कहा कि देशों की जिम्मेदारी केवल लक्ष्य निर्धारित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लक्ष्यों को लागू करने के लिए आवश्यक क्षमता विकसित करना और संसाधन जुटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

श्री यादव ने कहा कि भारत में जैव विविधता लोगों के जीवन, ज्ञान और आजीविका से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण और विकास को एक-दूसरे का पूरक बनना चाहिए। श्री यादव ने पर्यावरण के लिए जीवनशैली (लाइफ) के सिद्धांत का भी जिक्र किया और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखने में सतत विकल्पों तथा जिम्मेदार उपभोग के महत्व से भी अवगत कराया।

कार्यक्रम के दौरान गणमान्य व्यक्तियों ने निम्नलिखित चार प्रकाशनों का विमोचन किया:

1. भारत के अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (आई-ओईसीएम) को नामित करने के लिए दिशा-निर्देश, 2026: ये दिशा-निर्देश उपयुक्त मानदंडों और शासन व्यवस्था के अधीन, पारंपरिक संरक्षित क्षेत्रों से परे संरक्षण संबंधी परिणामों को मान्यता देने में सहायक होंगे। इनमें यह स्वीकार किया गया है कि विभिन्न प्रकार के भू-दृश्यों और प्रबंधन प्रणालियों के अंतर्गत भी प्रभावी संरक्षण किया जा सकता है।

2. कार्टाजेना जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल पर पांचवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट: यह रिपोर्ट पारदर्शी रिपोर्टिंग और जैव सुरक्षा के उत्तरदायी शासन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

3. जैव विविधता संधि पुस्तिका: संदर्भ मार्गदर्शिका और भारतीय परिप्रेक्ष्य: इस पुस्तिका का उद्देश्य तेजी से जटिल होते अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया संबंधी विषयों पर सुलभ संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराकर सूचित भागीदारी और कार्यान्वयन में निरंतरता को मजबूत करना है।

4. भारत की पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (एबीएस) की सफलता की गाथा: यह पुस्तक पहुंच एवं लाभ-साझाकरण के क्षेत्र में भारत की वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त अग्रणी भूमिका को दर्शाती है।

श्री यादव ने कहा कि ये प्रकाशन परस्पर संबंधित प्राथमिकताओं को संबोधित करते हैं, जिनमें संरक्षण संबंधी योगदानों की पहचान करना, संस्थागत समझ को मजबूत करना और कार्यान्वयन की प्रगति पर रिपोर्टिंग करना शामिल है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जैव विविधता से जुड़े महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ठोस दिशा-निर्देश, विश्वसनीय जानकारी और सार्वजनिक जवाबदेही आवश्यक हैं। उन्‍होंने आह्वान किया कि प्रगति का आकलन केवल घोषणाओं, जुटाए गए संसाधनों और चिह्नित क्षेत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि कार्यान्वयन, प्राप्त लाभों और संरक्षण के निरंतर परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।

पहुंच एवं लाभ-साझाकरण के महत्व का जिक्र करते हुए श्री यादव ने कहा कि नागोया प्रोटोकॉल आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त होने वाले लाभों के निष्पक्ष और न्यायसंगत बंटवारे का आधार प्रदान करता है। उन्होंने इस सिद्धांत को व्यावहारिक, पारदर्शी और न्यायसंगत प्रक्रियाओं में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव दर्शाता है कि नीतिगत सुधारों के साथ सक्षम संस्थानों, डिजिटल नवाचार तथा समुदायों और जिम्मेदार व्यवसायों की सहभागिता को जोड़ना महत्वपूर्ण है।

श्री यादव ने जोर देकर कहा कि कोई भी देश अकेले वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान करने, व्यावहारिक ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा उपयुक्त वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी तक पहुंच बढ़ाने वाले अंतरराष्ट्रीय सहयोग का स्वागत किया। श्री यादव ने रचनात्मक संवाद, जिसमें दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तहत ज्ञान का आदान-प्रदान भी शामिल है, के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने ऐसे दृष्टिकोण अपनाने पर भी बल दिया, जिनसे देश सफल विचारों और पहलों को अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुरूप लागू कर सकें।

उन्होंने कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के कार्यान्वयन को आगे बढ़ाने तथा जैव विविधता से जुड़ी साझा महत्वाकांक्षाओं को दीर्घकालिक परिणामों में बदलने के लिए सभी पक्षकारों और साझेदारों के साथ मिलकर काम करने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।

कार्यक्रम के दौरान आर्मेनिया के पर्यावरण मंत्री श्री हम्बार्जुम मातेवोस्यान और जैव विविधता संधि सचिवालय (एससीबीडी) की पहुंच एवं लाभ-साझाकरण (एबीएस) इकाई के प्रमुख डॉ. तौकोंदजो शिकोंगो ने जैव विविधता संरक्षण तथा पहुंच एवं लाभ-साझाकरण को आगे बढ़ाने के लिए भारत के प्रयासों की सराहना की। उनके वक्तव्यों में वैश्विक जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को प्रभावी कार्यान्वयन में बदलने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निरंतर साझेदारी के महत्व को रेखांकित किया गया।

पीके/केसी/आरटी/एवाई/वाईबी

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