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विजयदशमी पर प्रधानमंत्री का संबोधन: जनसेवा, विरासत और एकजुटता पर जोर

Key details of this update
DetailInformation
Date20 October 2026 (Tuesday)
Time7:53 PM
Topic / Ministryप्रधानमंत्री कार्यालय
Languageहिन्दी
Reading time5 min (876 words)

दिल्ली में विजयदशमी समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भगवान श्रीराम का स्मरण किया। उनके भाषण में पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के साथ जनसेवा और राष्ट्रीय एकता का संदेश जुड़ा रहा।

प्रधानमंत्री ने प्रभु श्रीराम, माता जानकी और बजरंग बली के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए देशवासियों को विजयदशमी की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने इस अवसर को सत्य की विजय से जुड़ी आस्था और समाज के लिए उपयोगी आदर्शों को याद करने का समय बताया।

संबोधन में उन्होंने गाँवों और शहरों में आयोजित रामलीलाओं का उल्लेख किया। उनके अनुसार, इन आयोजनों के माध्यम से भगवान राम के आदर्शों को जीवंत रखने की परंपरा आगे बढ़ती है। उन्होंने अत्याचार और आतंक के अंत तथा असत्य पर सत्य की विजय के भाव को पर्व से जोड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सांस्कृतिक चेतना देश के जीवन से गहराई से जुड़ी है और विजयदशमी का उत्सव अधर्म पर धर्म की जीत के संकल्प को दोहराने का अवसर देता है।

प्रधानमंत्री ने उपस्थित लोगों से श्रीराम के जयकारे के साथ इस भावना को व्यक्त करने का आह्वान किया। इसके बाद उन्होंने भगवान राम के जीवन से मिलने वाली सीख और नागरिकों के प्रति शासन की जिम्मेदारी पर विस्तार से बात की।

उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति में भगवान राम के प्रति श्रद्धा का आधार केवल रावण पर उनकी विजय नहीं है। उनके जीवन में दिखाई देने वाले आदर्श भी इस आस्था का महत्वपूर्ण कारण हैं। प्रधानमंत्री ने इन आदर्शों को मानवता के लिए विशेष महत्व वाला बताया और कठिन परिस्थितियों में भी सत्य तथा नीति का पालन करने के प्रसंगों की चर्चा की।

भगवान राम के चरित्र का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कठिनाइयाँ आने पर भी उन्होंने सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्होंने संस्कृत पंक्ति ‘प्रसन्नतां या न गत अभिषेकतः तथा,न मम्ले वनवास दुःखतः॥’ का संदर्भ देकर समझाया कि राजपद मिलने और वनवास जाने की स्थितियों में भी राम का धैर्य बना रहा। वनवास के दौरान निषादराज और माता शबरी के साथ उनके व्यवहार को उन्होंने सम्मान, करुणा और सौहार्द से जोड़ा। अयोध्या लौटने के बाद स्थापित रामराज्य की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने न्याय, समान अवसर और भेदभाव से मुक्त शासन के आदर्श रखे। उन्होंने कहा कि सत्ता का उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥’ के माध्यम से उन्होंने इसी भावना को स्पष्ट किया। नागरिकों को सम्मान देने, ‘नागरिक देवो भव’ के भाव से काम करने तथा गरीब और वंचित लोगों की सेवा को प्राथमिकता देने की बात भी उनके संबोधन का हिस्सा रही।

प्रधानमंत्री ने संकटों के समाधान के लिए अपने सामर्थ्य, संसाधनों और परिश्रम पर विश्वास करने की सीख पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि चुनौती कठिन होने पर भी केवल दूसरों के भरोसे बैठना उचित नहीं है। रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने समुद्र और लंका तक पहुँचने की कठिनाई के बीच सामूहिक शक्ति, जनभागीदारी और उपलब्ध साधनों को जोड़ने की बात कही। उनके अनुसार, दृढ़ संकल्प और मिलकर किए गए प्रयास कठिन दिखाई देने वाले लक्ष्य को संभव बना सकते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों का उल्लेख किया। जनता की शक्ति को जनकल्याण से जोड़ने तथा लोगों की आकांक्षाएँ पूरी करने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता भी उन्होंने सामने रखी।

सांस्कृतिक विरासत के विषय पर प्रधानमंत्री ने आत्मसम्मान और ऐतिहासिक पहचान के संबंध की चर्चा की। उन्होंने कहा कि देश अपनी धरोहरों को संरक्षित करने के साथ विदेश ले जाई गई प्राचीन वस्तुओं को वापस लाने का प्रयास कर रहा है। उनके अनुसार, बीते 12 वर्षों में साढ़े छह सौ से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ भारत लाई गई हैं। उन्होंने सांस्कृतिक केंद्रों को वैश्विक पहचान मिलने और भारतीय स्थलों के यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने का भी उल्लेख किया। दीपावली को पिछले वर्ष मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में स्थान मिलने की बात कहते हुए उन्होंने इन उपलब्धियों को लोगों की सामूहिक इच्छाशक्ति से जोड़ा और आगे भी उसी निष्ठा से काम करने का संदेश दिया।

विजयदशमी को जीत और साहस का पर्व बताते हुए प्रधानमंत्री ने सत्य तथा मानवता के साथ खड़े रहने का महत्व समझाया। उन्होंने वैदिक पंक्ति ‘समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।’ का उल्लेख करके साझा विचार और राष्ट्रहित में सहयोग का अर्थ स्पष्ट किया। उनके संबोधन में देश की संस्थाओं तथा राजनीतिक दलों के राष्ट्रहित के विषयों पर मिलकर खड़े होने की बात शामिल थी। उन्होंने राष्ट्रीय सम्मान को चोट पहुँचाने, समाज को बाँटने और संस्कृति के प्रति घृणा फैलाने वाली प्रवृत्तियों का विरोध करने का आह्वान किया। ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने पर जोर दिया। अयोध्या मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान रखी गई ‘राम से राष्ट्र’ और ‘देव से देश’ की संकल्पना का संदर्भ भी उन्होंने दिया। भाषण के इस हिस्से में उन्होंने देशवासियों को दशहरे की शुभकामनाएँ फिर दीं और पर्व से जुड़े संकल्प दोहराने की बात कही।

संबोधन के समापन पर प्रधानमंत्री ने ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष किया। इस तरह भाषण का अंतिम संदेश राष्ट्रीय एकजुटता और साझा संकल्प के भाव से जुड़ा रहा।

उन्होंने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपना संबोधन समाप्त किया। यहाँ प्रस्तुत विवरण आधिकारिक भाषण के विषयों को समाचार शैली में समझाता है; यह भाषण की शब्दशः प्रति नहीं है।

Source: Press Information Bureau, Government of India · Read the official release

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