सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सचिव श्री सुधांश पंत ने असम की राजधानी गुवाहाटी के खानापारा स्थित फार्म गेट में आयोजित शिल्प समागम मेले का दौरा किया।
सचिव ने मेले में भाग लेने वाले कारीगरों के स्टॉलों और मंत्रालय के पवेलियन का भ्रमण किया तथा उनका निरीक्षण किया।
गुवाहाटी में आयोजित शिल्प समागम मेला(एसएसएम) 2026 में लगातार आगंतुकों की भीड़ उमड़ रही है। यह मेला पारंपरिक कारीगरों को अपने हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों को प्रदर्शित करने तथा उसकी बिक्री के लिए एक बेहतरीन मंच प्रदान कर रहा है।
अपने दौरे के दौरान सचिव ने प्रदर्शित किए गए विभिन्न पारंपरिक उत्पादों का अवलोकन किया और कारीगरों से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने उनके शिल्प कौशल, उत्पादों तथा बाजार में उपलब्ध अवसरों के बारे में भी जानकारी प्राप्त की।
उन्होंने मंत्रालय के पवेलियन(मंडप) का भी दौरा किया, जहां प्रदर्शनियों और सूचनात्मक सामग्री के माध्यम से आगंतुकों को मंत्रालय की कल्याणकारी योजनाओं, वित्तीय सहायता तथा विकास संबंधी योजनाओं की जानकारी दी जा रही है।
भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आयोजित आठ दिवसीय मेले का शुभारंभ 21 अक्टूबर को हुआ था और यह कल, 28 अक्टूबर तक जारी रहेगा।
यह मेला प्रतिदिन सुबह 11:00 बजे से रात 9:00 बजे तक आगंतुकों के लिए खुला रहता है। यह कारीगरों को उपभोक्ताओं से सीधे जुड़ने, आय अर्जित करने और अपने बिजनेस का विस्तार के नए अवसर तलाशने का मौका प्रदान करता है।
गुवाहाटी में आयोजित यह मेला वित्त वर्ष 2026–27 के लिए शिल्प समागम श्रृंखला का दूसरा मेला है। इससे पहले, इस श्रृंखला का पहला मेला कर्नाटक के मैसूरु स्थित दशहरा प्रदर्शनी मैदान में 19 अक्टूबर, 2026 को सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था।
इस अवसर पर श्री पंत ने कहा कि यह पहल माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सिद्धांत से प्रेरित विजन के अनुरूप अनुसूचित जातियों(एससी), अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी), सफाई मित्रों और विमुक्त जनजातियों(डीएनटी) से संबंधित कारीगरों के आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देती है।
सचिव ने बताया कि गुवाहाटी मेले में 31 महिला कारीगरों सहित कुल 75 कारीगर भाग ले रहे हैं, जो हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों की लगभग 40 किस्मों का प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि इन प्रदर्शित उत्पादों में भारत की समृद्ध कलात्मक परंपराओं, स्वदेशी कौशल और क्षेत्रीय विविधता की झलक देखने को मिलती है। इस मेले में पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों के कारीगर भी भाग ले रहे हैं।
श्री पंत ने कहा कि यह मेला कारीगरों को अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने, ग्राहकों से सीधे जुड़ने और अपने उत्पादों के संबंध में उनसे प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए एक समर्पित मंच प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं के साथ सीधे संवाद से कारीगरों को बाजार की पसंद को समझने, ग्राहकों के साथ संबंध स्थापित करने और अपनी पहुंच बढ़ाने के अवसरों की पहचान करने में मदद मिलती है। उन्होंने आगे कहा कि इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक शिल्प कौशल और समकालीन बाजारों के बीच संबंधों को मजबूत करना है, जिससे कारीगर अपने कौशल को आजीविका के स्थायी अवसरों में बदल सकें और साथ ही भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी कर सकें।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि स्थानीय और अन्य कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे दैनिक सांस्कृतिक कार्यक्रम मेले के आकर्षण को और बढ़ा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में पूर्वोत्तर राज्यों की संगीत और नृत्य प्रस्तुतियों सहित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि इन प्रस्तुतियों से आगंतुकों को देश के विविध हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों के साथ-साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराओं का अनुभव करने का अवसर मिलता है। उन्होंने यह भी बताया कि इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण भी किया जा रहा है, जिससे इन्हें मेले के आयोजन स्थल से बाहर तक के दर्शकों तक पहुंचाया जा सके।
अधिकारी ने बताया कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की कल्याणकारी, वित्तीय सहायता और विकास योजनाओं की जानकारी प्रसारित करने के लिए मेले में मंत्रालय का एक समर्पित पवेलियन स्थापित किया गया है। उन्होंने कहा कि इस पवेलियन में मंत्रालय के तीन राष्ट्रीय निगमों के माध्यम से संचालित योजनाओं और कार्यक्रमों को भी प्रदर्शित किया गया है, जिससे आगंतुक पात्र लाभार्थियों के लिए उपलब्ध सहायता और सहयोग के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें।
अधिकारी ने आगे बताया कि मंत्रालय की योजनाओं और कार्यक्रमों से संबंधित सूचनात्मक सामग्री प्रदर्शित करने के लिए पवेलियन में एलईडी डिस्प्ले स्क्रीन लगाए गए हैं। इस पहल का उद्देश्य सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तीकरण, उद्यमिता और आजीविका सृजन को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना है।
यह पवेलियन सरकारी योजनाओं की जानकारी सीधे आगंतुकों तक पहुंचाकर मेले की बाजारोन्मुख गतिविधियों को पूरक सहयोग प्रदान करता है। इसमें कारीगरों और पात्र समुदायों के सदस्यों सहित ऐसे आगंतुक शामिल हैं, जो इन पहलों के माध्यम से मिलने वाली सहायता और सुविधाओं से लाभान्वित हो सकते हैं।
अधिकारी ने कहा कि शिल्प समागम मेले का एक प्रमुख उद्देश्य भारत—ट्यूलिप(पारंपरिक कारीगरों के उत्थान हेतु आजीविका कार्यक्रम) को बढ़ावा देना है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य लक्षित समूहों से संबंधित कारीगरों द्वारा निर्मित उत्पादों के विपणन को सुगम बनाना है, जिसके लिए भौतिक बिक्री केंद्रों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाता है।
उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य व्यापक बाजारों और डिजिटल बिक्री माध्यमों तक पहुंच उपलब्ध कराकर कारीगरों की ग्राहकों तक पहुंच बढ़ाना, बाजार के साथ उनके जुड़ाव को मजबूत करना तथा उनकी आय में वृद्धि के लिए अतिरिक्त अवसर पैदा करना है।
अधिकारी ने कहा कि यह पहल कारीगरों और उनके उत्पादों को बदलते उपभोक्ता बाजारों से जोड़कर पारंपरिक कला एवं शिल्प को निरंतर बढ़ावा देने में भी सहायक है। उन्होंने आगे कहा कि प्रत्यक्ष बिक्री, उपभोक्ताओं के साथ संवाद और व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच के अवसर प्रदान करके यह मेला कारीगरों को अपनी उद्यमशीलता क्षमताओं को मजबूत करने तथा बिजनेस के सतत विकास के अवसर तलाशने के लिए प्रोत्साहित करता है।
शिल्प समागम मेला सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसका उद्देश्य मंत्रालय के तीन राष्ट्रीय निगमों–राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम(एनएसएफडीसी), राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम(एनएसकेएफडीसी) और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम(एनबीसीएफडीसी)–से जुड़े कारीगरों और लाभार्थियों को विपणन में सहायता प्रदान करना है।
बाजार तक पहुंच, जन-सहभागिता, सांस्कृतिक संवर्धन और सूचना प्रसार को एक साथ जोड़कर शिल्प समागम मेले का उद्देश्य उद्यमिता को मजबूत करना तथा पात्र समुदायों के लिए आजीविका के स्थायी अवसर उपलब्ध कराना है। सचिव श्री सुधांश पंत का यह दौरा कारीगरों को अपने कौशल को प्रदर्शित करने, उपभोक्ताओं से जुड़ने और आर्थिक उन्नति के अवसर तलाशने के लिए मंच उपलब्ध कराने के महत्व को सामने लाता है।
शिल्प समागम मेला जैसी पहलों के माध्यम से, मंत्रालय पारंपरिक उत्पादों की व्यापक पहचान दिलाने, बाजार से जुड़ाव को बढ़ावा देने और कारीगरों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण में सहयोग प्रदान करने के अपने प्रयास जारी रखे हुए है, साथ ही, यह भारत की समृद्ध हथकरघा, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक परंपराओं को भी संरक्षित कर रहा है।
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