डीआईपीएएम की ओर से वित्त वर्ष 2025-26 में अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं के अनुसार पहली या प्रारंभिक बोली प्रक्रिया आयोजित की गई थी, जो सांकेतिक दिशानिर्देशों के रूप में हैं, न कि कठोर नियम या विनियम। प्रस्तावना में ही कहा गया है कि सुझाई गई प्रक्रिया को एक कठोर, कानूनी फ्रेमवर्क नहीं माना जाना चाहिए, जिसमें समयबद्ध तरीके से लेन-देन के सफल निष्पादन के लिए उचित अनुकूलन/ संशोधन की जरूरत हो सकती है। रणनीतिक लेन-देन की जटिल प्रकृति को देखते हुए, सांकेतिक दिशानिर्देश लचीलापन प्रदान करते हैं, जिससे लंबी प्रक्रियाओं में लगने वाली लागत और समय व्यर्थ न जाए।
दिनांक 14.10.2026 के प्रेस नोट में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि बोली लगाने के लिए कोई पूर्व निर्धारित मानदंड नहीं है। बोलीदाता स्वयं मूल्यांकन करते हैं और गोपनीय तरीके से अपनी बोलियां जमा करते हैं। उद्यम का उचित मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र एजेंसियों को नियुक्त किया जाता है, जिनका इस्तेमाल प्रस्तुत बोलियों की तर्कसंगतता का आकलन करने के लिए तुलनात्मक आधार के रूप में किया जाता है। इसलिए, बोली में निर्धारित मूल्य और तुलनात्मक मूल्यांकन एक दूसरे से अधिक या कम हो सकते हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए, आरएफपी के पैरा 5.3.6(iii) में पूर्व-निर्धारित प्रावधान है: "यदि उच्चतम बोलीदाता की वित्तीय बोली आरक्षित मूल्य से कम है, तो भारत सरकार आगे की कार्रवाई तय करेगी और क्यूआईपी इस संबंध में भारत सरकार की ओर से लिए गए किसी भी निर्णय पर बाद में सवाल नहीं उठाएंगे।"
डीआईपीएएम के भीतर इस स्थिति से निपटने के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है और इस उद्देश्य के लिए कैबिनेट कमेटी ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स (सीसीईए) की ओर से विनिवेश सचिवों के कोर ग्रुप (सीजीडी) को विशेष शक्तियां सौंपी गई हैं। 16 अगस्त, 2017 को हुई अपनी बैठक में, 'रणनीतिक विनिवेश के लिए प्रक्रिया और तंत्र – इसका प्रत्यायोजन' शीर्षक वाले नोट को मंजूरी देते हुए, सीसीईए ने सीजीडी को प्रक्रिया से विचलन सहित सभी कठिनाइयों को दूर करने का अधिकार दिया है, जिससे सीसीईए की ओर से मंजूर किए गए रणनीतिक विनिवेश लेन-देन का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके। निर्णय का सारांश इस प्रकार है:
“8.1 रणनीतिक विनिवेश के मामले में सीसीईए की स्वीकृति मांगी जाती है…(ii) प्रक्रियात्मक मुद्दों के संबंध में नीतिगत निर्णय लेने और सीसीईए के निर्णयों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए समय-समय पर आवश्यक विचलनों पर विचार करने के लिए सीजीडी को सशक्त बनाने के लिए।” निर्णय: 16 अगस्त, 2017 को सीसीईए की बैठक में स्वीकृत।
इन शक्तियों का उचित प्रयोग करते हुए, दूसरे या सर्वोत्तम प्रस्ताव दौर की प्रक्रिया सीजीडी की ओर से ही निर्धारित की गई थी। आरक्षित मूल्य में न तो कोई कमी की गई और न ही कोई बढ़ोतरी की गई, और प्रारंभिक बोलियों को मंजूरी न मिलने के बाद पहला दौर अपने आप ही समाप्त हो गया।
सर्वोत्तम प्रस्ताव आमंत्रित करने से पहले, अप्रैल 2026 में सीजीडी की ओर से संपूर्ण मूल्यांकन पद्धति की समीक्षा की गई थी। चूंकि मूल्यांकन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला तुलनात्मक मापदंड प्राप्त बोलियों के समकालीन होना आवश्यक है, और 31 मार्च, 2026 को समाप्त हुए वित्तीय खाते अप्रैल के अंत में सार्वजनिक किए गए थे, इसलिए स्वतंत्र मूल्यांकन एजेंसियों ने मई 2026 में ही संशोधित मूल्यांकनों पर काम शुरू कर दिया था। यह प्रक्रिया दोहरी गोपनीयता वाली रही क्योंकि बोलीदाता को मूल्यांकन की जानकारी नहीं थी और मूल्यांकनकर्ताओं ने बोलियां नहीं देखी थीं। केवल सीजीडी को ही पूरी जानकारी मिलती है और वह प्रस्तुत बोलियों की तर्कसंगतता पर अंतिम निर्णय लेने के लिए उनकी तुलना उचित मूल्यांकनों से करता है।
मूल्यांकन दो अलग-अलग सलाहकारों के माध्यम से स्वतंत्र रूप से और अलग-अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करके किया गया था। प्रोटोकॉल के अनुसार, व्यावसायिक मूल्यांकन हमेशा लेन-देन सलाहकार के माध्यम से किया जाता है, जिन्होंने इस लेन-देन की जटिल प्रकृति को देखते हुए, बाजार गुणक विधि में प्रशिक्षित पेशेवर विशेषज्ञों को नियुक्त किया। संक्षेप में, बाजार गुणक विधि के दो उप-प्रकार: तुलनीय कंपनी विधि और तुलनीय लेन-देन विधि; हैं। चूंकि उपयुक्त तुलनीय लेन-देन उपलब्ध नहीं थे, इसलिए तुलनीय कंपनियों की विधि का इस्तेमाल किया गया, जो इस मामले में सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक थे। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि आईडीबीआई 2019 तक एक सरकारी स्वामित्व वाली बैंकिंग कंपनी थी, लेकिन 2019 में एलआईसी द्वारा बहुमत हिस्सेदारी हासिल करने के बाद यह एक सरकारी नियंत्रित बैंकिंग कंपनी बन गई। चूंकि इस स्थिति के लिए कोई विशिष्ट नियामक प्रोटोकॉल नहीं है, इसलिए आरबीआई ने इसे केवल नियामक उद्देश्यों के लिए एक निजी बैंक के रूप में मानना शुरू कर दिया, भले ही स्वामित्व मुख्य रूप से एलआईसी और भारत सरकार के पास रहा, और बाजार के निवेशक इसे एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई के रूप में ही आंकते रहे।
संपत्ति मूल्यांकनकर्ता ने मजबूत और समय-परीक्षित पद्धतियों का इस्तेमाल किया, जिसमें विवादित कर मांगों के लिए अतिरिक्त मूल्य भी शामिल था, जिसे योग्य बोलीदाताओं की सामान्य मांग के रूप में समायोजित किया गया, जिससे बोली प्रस्ताव को ऊपर की ओर बढ़ाया जा सके। यह एक कम संभावना वाली घटना है और सरकार के लिए राजस्व के लिहाज से तटस्थ है, क्योंकि केवल अतिरिक्त कर मांग, यदि भुगतान की जाती है, तो प्रतिपूर्ति के लिए पात्र होगी। इस मद पर संभावित देयता केवल 627 करोड़ रुपये थी, जबकि बोली की निर्धारित कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई, जिससे भारत सरकार और एलआईसी के लिए लेन-देन का मूल्य बढ़ गया।
सीमित कारोबार वाले आईडीबीआई शेयर की अस्थिर कीमत और इसे क्यों हटाया गया, इसका विस्तृत विवरण 14.10.2026 की प्रेस विज्ञप्ति में दिया गया है। भारत सरकार और एलआईसी ने आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन के बाद भविष्य में अपेक्षित मूल्य की बढ़ोतरी से लाभ उठाने के लिए अवशिष्ट शेयरधारिता अपने पास रखी है।
पीके/केसी/आरटी/एमएम
