अंतरराष्ट्रीय बायोस्फीयर रिजर्व दिवस हमें जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ मानव आजीविका को बनाए रखने में इन प्राकृतिक क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका की याद दिलाता है। भारत में अधिसूचित 18 बायोस्फीयर रिजर्व हैं, जिनमें से 13 को यूनेस्को की मान्यता प्राप्त है। ये पश्चिमी घाट से लेकर ऊंचाई वाले मरुस्थलीय क्षेत्रों और समुद्री पर्यावासों तक विभिन्न प्रकार के इकोसिस्टम का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन क्षेत्रों के संरक्षण के प्रयासों में वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सरकारी पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये प्रयास दर्शाते हैं कि पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन
जैव विविधता से तात्पर्य स्थलीय, समुद्री और अन्य जलीय प्राकृतिक पर्यावरणों में पाए जाने वाले जीवों की विविधता से है। कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) इस विविधता के तीन स्तरों को मान्यता देता है। जेनेटिक डायवर्सिटी से तात्पर्य एक ही प्रजाति के भीतर पाई जाने वाली भिन्नताओं से है, जैसे चावल की विभिन्न किस्में। प्रजातीय विविधता से आशय किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों से है, जैसे किसी जंगल में बाघ, हाथी और ऑर्किड। प्राकृतिक पर्यावरणों की विविधता में विभिन्न प्राकृतिक आवास शामिल हैं, जिनमें वन, घास के मैदान, आर्द्रभूमि और कोरल रीफ प्रमुख हैं। ये तीनों स्तर मिलकर प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बनाए रखने और पृथ्वी पर जीवन को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बायोस्फीयर रिजर्व ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सरकारों द्वारा चिह्नित किया जाता है। ये प्राकृतिक आवासों की रक्षा करते हैं, पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं और जैविक संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं। इनके संरक्षण से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, जल की उपलब्धता बनाए रखने, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की क्षमता बढ़ाने और स्थानीय समुदायों की आजीविका को मजबूत करने में मदद मिलती है। साथ ही, ये भावी पीढ़ियों के हित में प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इनके वैश्विक महत्व को देखते हुए, प्रत्येक वर्ष 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बायोस्फीयर रिजर्व दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को द्वारा घोषित यह दिवस जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास में इन क्षेत्रों के योगदान को रेखांकित करता है। साथ ही, यह पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने में बायोस्फीयर रिजर्व की भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है।
भारत के लिए यह दिवस अपनी समृद्ध प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। विश्व के 17 सर्वाधिक जैव-विविधता वाले देशों में शामिल भारत में विश्वभर में दर्ज की गई कुल प्रजातियों का लगभग 7–8 प्रतिशत हिस्सा पाया जाता है, जबकि पृथ्वी के कुल भू-भाग में भारत की हिस्सेदारी केवल 2.4 प्रतिशत है। अपने बायोस्फीयर रिजर्व के नेटवर्क के माध्यम से भारत पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की क्षमता को मजबूत करने और आजीविका के सतत साधनों को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है। ये प्रयास संरक्षण की प्राथमिकताओं और स्थानीय समुदायों की विकास संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की देश की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
बायोस्फीयर रिजर्व की अवधारणा और महत्व
जैव विविधता के संरक्षण के लिए ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें प्राकृतिक पर्यावरण और उन पर निर्भर समुदायों, दोनों के हितों का ध्यान रखा जाए। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, संसाधनों का जिम्मेदारीपूर्ण प्रबंधन और विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग भी आवश्यक है। बायोस्फीयर रिजर्व इन सभी उद्देश्यों को एक साथ आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त एक रूपरेखा प्रदान करते हैं।
वर्ष 1971 में शुरू किया गया यूनेस्को का मैन एंड द बायोस्फीयर कार्यक्रम मानव और उसके पर्यावरण के बीच बेहतर संबंध स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। बायोस्फीयर रिजर्व सतत विकास से जुड़ी गतिविधियों के परीक्षण और प्रदर्शन के लिए जीवंत प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करते हैं। ये स्थानीय समुदायों को प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखते हुए अपनी आजीविका के साधनों को बनाए रखने में भी मदद करते हैं।
बायोस्फीयर रिजर्व अन्य संरक्षित क्षेत्रों से किस प्रकार अलग हैं?
राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों जैसे संरक्षित क्षेत्रों का मुख्य उद्देश्य भारत के वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना है। वहीं, बायोस्फीयर रिजर्व इससे व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हैं। ये संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्रों को आसपास रहने वाले समुदायों से जोड़ते हैं और इस प्रकार एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जो दर्शाता है कि जैव विविधता का संरक्षण और मानव कल्याण एक साथ संभव हैं।
बायोस्फीयर रिजर्व के प्रमुख कार्य
बायोस्फीयर रिजर्व के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:
संरक्षण: जैव विविधता, आनुवंशिक संसाधनों, प्राकृतिक तंत्रों और प्राकृतिक भू-दृश्यों के साथ-साथ उनसे जुड़ी सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण करना।
सतत आर्थिक विकास: ऐसी आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना, जो पर्यावरणीय सीमाओं और स्थानीय सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान करती हों।
वैज्ञानिक सहयोग: संरक्षण के उपायों को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरणीय निगरानी, शिक्षा, प्रशिक्षण और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
बायोस्फीयर रिजर्व के तीन प्रमुख क्षेत्र
बायोस्फीयर रिजर्व में विभिन्न क्षेत्रों को अलग-अलग स्तर के संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के आधार पर विभाजित किया जाता है। प्रत्येक क्षेत्र का अपना विशिष्ट उद्देश्य होता है और सभी मिलकर बायोस्फीयर रिजर्व के समग्र लक्ष्यों को पूरा करने में योगदान देते हैं।
मुख्य क्षेत्र (कोर एरिया): यह क्षेत्र प्राकृतिक पर्यावरण और जैव विविधता को सर्वोच्च स्तर का संरक्षण प्रदान करता है। इसमें प्राकृतिक आवासों, प्रजातियों और आनुवंशिक विविधता को सुरक्षित रखने के साथ-साथ आवश्यक प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बनाए रखा जाता है। यहां मानवीय गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध होते हैं। हालांकि, दीर्घकालिक संरक्षण के उद्देश्य से अनुकूल वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी की अनुमति दी जाती है।
बफर जोन: यह क्षेत्र मुख्य क्षेत्र (कोर जोन) के चारों ओर या उससे सटा हुआ होता है। यहां संरक्षण के अनुकूल गतिविधियों की अनुमति होती है, जिनमें पर्यावरण शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और नियमन के तहत इको-टूरिज्म शामिल हैं। इन गतिविधियों से प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति समझ बढ़ती है और साथ ही पूरी तरह संरक्षित क्षेत्रों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में भी मदद मिलती है।
ट्रांजिशन जोन: यह क्षेत्र स्थानीय बस्तियों, आजीविका और सतत आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है। यहां समुदाय जिम्मेदारीपूर्ण कृषि, सतत वानिकी, इको-टूरिज्म और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल अन्य गतिविधियां संचालित कर सकते हैं। इस क्षेत्र का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करते हुए स्थानीय लोगों की आजीविका को बेहतर बनाना है।
विश्व स्तर पर, बायोस्फीयर रिजर्व के कुल क्षेत्रफल में औसतन 18 प्रतिशत हिस्सा कोर जोन, 30 प्रतिशत बफर जोन और 52 प्रतिशत हिस्सा ट्रांजिशन जोन का होता है। यह वितरण संरक्षण के प्रति उनके समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें कड़े संरक्षण के साथ-साथ सतत विकास के बीच संतुलन बनाए रखा जाता है।
क्या आप जानते हैं?
यूनेस्को के विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क में 145 देशों के कुल 797 बायोस्फीयर रिजर्व शामिल हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 300 मिलियन लोगों को इनसे प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। इनका प्राकृतिक महत्व इनके भौगोलिक दायरे से कहीं अधिक व्यापक है। बायोस्फीयर रिजर्व पृथ्वी के कुल स्थलीय क्षेत्रफल के लगभग 5 प्रतिशत हिस्से में फैले हैं, लेकिन इनमें कशेरुकी प्रजातियों (विश्व की रीढ़ की हड्डी वाले जीवों की प्रजातियों) की 60 प्रतिशत से अधिक विविधता पाई जाती है। विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क के मानचित्र 2025-26 के अनुसार, वर्ष 2050 तक लगभग 40 प्रतिशत बायोस्फीयर रिजर्व को जलवायु संबंधी अधिक गंभीर घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, 50 प्रतिशत से अधिक बायोस्फीयर रिजर्व किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत भी आते हैं।
भारत बायोस्फीयर रिजर्व के संरक्षण और उनके बेहतर प्रबंधन की दिशा में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यह जैव विविधता के संरक्षण और प्राकृतिक प्राकृतिक तंत्र को बनाए रखने वाली सतत प्रथाओं को बढ़ावा देने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत का बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क
भारत का बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क देश के विविध प्राकृतिक क्षेत्रों और समृद्ध प्राकृतिक विरासत को दर्शाता है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) के अनुसार, देश में 18 अधिसूचित बायोस्फीयर रिजर्व हैं, जिनमें से 13 यूनेस्को के विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क में शामिल हैं। यह दक्षिण एशिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त बायोस्फीयर रिजर्व की सबसे अधिक संख्या है।
बायोस्फीयर रिजर्व का नाम
नामित किए जाने का वर्ष
विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क (डब्ल्यूएनबीआर) में शामिल होने का वर्ष
क्षेत्रफल (वर्ग किमी.)
तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक
मन्नार की खाड़ी *
अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह
अरुणाचल प्रदेश
खांगचेंदजोंगा*
केरल और तमिलनाडु
अचानकमार-अमरकंटक*
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
नोट: (*) का चिह्न उन बायोस्फीयर रिजर्व को दर्शाता है, जिन्हें यूनेस्को के विश्व बायोस्फीयर रिजर्व नेटवर्क (डब्ल्यूएनबीआर) में शामिल किया गया है।
इस विस्तारित नेटवर्क के साथ-साथ, भारत ने इन महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक विशेष कार्यक्रम भी शुरू किया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का बायोस्फीयर रिजर्व प्रभाग, केंद्र प्रायोजित योजना 'जैव विविधता संरक्षण' (बायोडायवर्सिटी कंजर्वेशन) का संचालन करता है। यह योजना व्यापक योजना 'कंजर्वेशन ऑफ नेचुरल रिसोर्सेज एंड इकोसिस्टम' के अंतर्गत एक उप-योजना के रूप में चलाई जाती है।
इस योजना के तहत, मंत्रालय यूनेस्को के मैन एंड द बायोस्फीयर प्रोग्राम के अंतर्गत नामित बायोस्फीयर रिजर्व को सहायता प्रदान करता है। इसके लिए संबंधित राज्यों को उनके प्रबंधन प्लान में निर्धारित संरक्षण एवं विकास संबंधी गतिविधियों के लिए अनुदान दिया जाता है। इस योजना का क्रियान्वयन राज्य के वन विभागों द्वारा किया जाता है। इसके तहत मंत्रालय राज्यों को लागत साझेदारी के आधार पर अनुदान प्रदान करता है। अन्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य का अंशदान 60:40 के अनुपात में, जबकि पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 (केंद्र: राज्य) का है।
वर्ष 2022-23 से मंत्रालय ने चार बायोस्फीयर रिजर्व के लिए पांच वर्षीय एकीकृत प्रबंधन योजनाओं की शुरुआत प्रायोगिक आधार पर की है। इनमें नंदा देवी (उत्तराखंड), पचमढ़ी (मध्य प्रदेश), देहांग-दिबांग (अरुणाचल प्रदेश) और अगस्त्यमलाई (केरल एवं तमिलनाडु) शामिल हैं। इन योजनाओं के तहत रिजर्व प्राधिकरणों, अनुसंधान संस्थानों और स्थानीय समुदायों को एक साथ जोड़ा गया है। इनमें प्राकृतिक आवासों का पुनरुद्धार, जैव विविधता की निगरानी, वैज्ञानिक अनुसंधान और आजीविका के सतत साधनों को बढ़ावा देने को प्राथमिकता दी गई है।
भारत सरकार का समग्र शासन (डब्ल्यूजीए) दृष्टिकोण
जैव विविधता का संरक्षण और बायोस्फीयर रिजर्व की सुरक्षा
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भारत के बायोस्फीयर रिजर्व की एक झलक
पर्वतीय वनों से लेकर मैंग्रोव डेल्टा, प्रवाल भित्तियों और ऊंचाई पर स्थित मरुस्थलों तक, भारत के बायोस्फीयर रिजर्व में प्रकृति की अद्भुत विविधता देखने को मिलती है।
नीलगिरि: पश्चिमी घाट में स्थित नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट है। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में लगभग 5,52,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस रिजर्व में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन, पर्वतीय शोला वन और घास के मैदान शामिल हैं। यहां की विविध प्राकृतिक संरचना समृद्ध जैव विविधता का आधार है, जिसमें कई स्थानिक और संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं। इस रिजर्व में संकटग्रस्त 'लायन-टेल्ड मकाक' (शेर जैसी पूंछ वाले बंदर) और नीलगिरि तहर के साथ-साथ हाथी, बाघ, गौर, सांभर और चीतल भी पाए जाते हैं। यहां स्तनधारियों की 100 से अधिक और पक्षियों की 550 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके अलावा, यहां सरीसृपों और उभयचरों की भी अनेक प्रजातियां मौजूद हैं। अकेले नीलगिरि जिले में पौधों की 6,000 से अधिक प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जो इस क्षेत्र की असाधारण वनस्पति विविधता को दर्शाती हैं।
