रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता 2.0’ का आह्वान किया है। इसके तहत अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास, अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) को सुदृढ़ करने तथा मजबूत आपूर्ति शृंखला विकसित करने पर जोर दिया गया है, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके और तकनीकी श्रेष्ठता हासिल की जा सके। इससे ‘विकसित भारत @ 2047’ के लक्ष्य को साकार करने में मदद मिलेगी। रक्षा मंत्री 26 अक्टूबर, 2026 को नई दिल्ली में भारतीय नौसेना के नौसैनिक नवाचार एवं स्वदेशीकरण संगोष्ठी ‘स्वावलंबन’ के पांचवें संस्करण को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भरता के पहले चरण में मिली सफलताओं को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। श्री सिंह ने कहा कि दूरदर्शी सोच और वैज्ञानिक अनुशासन से युक्त रक्षा क्षेत्र के नवोन्मेषक अधिक चुनौतीपूर्ण तकनीकी लक्ष्य हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
श्री राजनाथ सिंह ने पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में देश द्वारा की गई महत्वपूर्ण प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि अब तक हासिल की गई उपलब्धियों ने आत्मनिर्भरता के अगले चरण के लिए मजबूत आधार तैयार किया है। इस चरण में उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास और उन चुनौतीपूर्ण लक्ष्यों को हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिन्हें अब तक कठिन माना जाता रहा है। रक्षा मंत्री ने ऐसे उत्पादों के स्वदेशी विनिर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया, जो किफायती होने के साथ-साथ परिचालन की दृष्टि से बेहतर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हों।
रक्षा मंत्री ने आपूर्ति शृंखला प्रबंधन को केवल एक तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा रणनीतिक विषय बताया है। उन्होंने एक गतिशील रूपरेखा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें प्रत्येक वस्तु के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित हो, विकसित की जाने वाली प्रौद्योगिकियों तथा उनमें नवाचार करने वाले उद्योगों की पहचान की गई हो और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक संसाधनों का विवरण दिया गया हो। श्री सिंह ने कहा, “आपूर्ति शृंखला में निर्भरता के पीछे कुछ कच्चे माल, जैसे दुर्लभ मृदा तत्वों की देश में सीमित उपलब्धता और कुछ विशिष्ट प्रौद्योगिकियों का अभाव जैसे कारण हैं। हालांकि, बेहतर विकल्प विकसित होने या देश में आवश्यक संसाधन उपलब्ध होने तक कुछ हद तक बाहरी निर्भरता बनी रह सकती है। फिर भी, स्वदेशीकरण के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।”
श्री राजनाथ सिंह ने आपूर्ति मार्गों में संभावित व्यवधानों से निपटने के लिए पहले से तैयार रहने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी संकट के उत्पन्न होने का इंतजार करने के बजाय, बफर स्टॉक और घरेलू उत्पादन क्षमताओं का आकलन पहले ही कर लेना चाहिए। रक्षा मंत्री ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए अनुसंधान एवं विकास को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने देश की प्रतिभाओं पर भरोसा जताते हुए कहा कि निरंतर ध्यान और निवेश के माध्यम से वे स्वदेशी स्तर पर अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियां विकसित करने में सक्षम हैं।
रक्षा मंत्री ने अनुसंधान से जुड़े स्वाभाविक जोखिमों का उल्लेख करते हुए विफलता के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव लाने का आह्वान किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्नत अनुसंधान एवं विकास तंत्र वाले देशों में भी विफलता की दर अधिक होती है, जो नवाचार प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। श्री सिंह ने कहा, “हालांकि, जोखिम से बचने की प्रवृत्ति स्वाभाविक है, लेकिन यह एक अवसर भी प्रस्तुत करती है। तो क्या हम ऐसे वित्तपोषण तंत्र विकसित कर सकते हैं, जो उच्च जोखिम और उच्च प्रतिफल वाली परियोजनाओं को समर्थन दे सकें? क्या हम अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं, क्योंकि उसमें जोखिम उठाने की क्षमता अधिक होती है? हमें दो प्रमुख क्षेत्रों यानी कि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने और कम लागत वाली प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करने में आगे बढ़ने के तरीकों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। रक्षा मंत्री ने कहा कि निजी क्षेत्र में जोखिम उठाने की क्षमता अधिक होती है, जबकि कम लागत वाली प्रौद्योगिकियों के माध्यम से छोटे स्तर पर प्रयोग करके भी महत्वपूर्ण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।”
श्री राजनाथ सिंह ने इजरायली, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देशों में अनुसंधान एवं विकास की संस्कृति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इन देशों में नवाचार को जीवनशैली का अभिन्न अंग माना जाता है और विफलता को सीखने के अवसर के रूप में देखा जाता है। रक्षा मंत्री ने भारत में अनुसंधान एवं नवाचार की सुदृढ़ संस्कृति विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने इसके लिए उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग स्थापित करने, शैक्षणिक संस्थानों में अनुसंधान एवं नवाचार को अधिक प्रोत्साहन देने तथा युवाओं के लिए आरएंडडी के क्षेत्र में करियर बनाने के अधिक अवसर सृजित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
रक्षा मंत्री ने बताया कि नवाचार के लिए रक्षा उत्कृष्टता के लिए आईडेक्स पहल ने स्टार्टअप और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को ऐसी प्रौद्योगिकियां विकसित करने में सक्षम बनाया है, जिनके लिए पहले भारत आयात पर निर्भर था। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना द्वारा प्रस्तुत 229 चुनौतियों के जवाब में 4,000 से अधिक प्रस्ताव प्राप्त हुए, जो देश में उपलब्ध प्रतिभा की व्यापकता और उद्यमियों के उत्साह को दर्शाते हैं। श्री सिंह ने आईडेक्स के माध्यम से हुई प्रगति की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय स्टार्टअप और एमएसएमई ने नौसैनिक प्रणालियों, सेंसर, संचार तथा अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में समाधान विकसित किए हैं। इस प्रकार, उन्होंने परिचालन संबंधी चुनौतियों को नवाचार के अवसरों में बदल दिया है।
श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र में बदलती परिस्थितियों के कारण नौसैन्य युद्धपोतों की मांग लगातार बढ़ रही है। इन जहाजों के निर्माण में भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता को देखते हुए घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ लागत कम करने के उपायों पर भी विचार करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता के अगले चरण में केवल स्वदेशी उत्पादों की संख्या बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, कार्यक्षमता और किफायती होने पर भी ध्यान देना चाहिए। रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि आत्मनिर्भरता का उद्देश्य न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।
रक्षा मंत्री ने कहा, “हमारी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि धन की कमी प्रतिभाशाली युवाओं की आकांक्षाओं के आड़े न आए। 1,900 करोड़ रुपये से अधिक के नौसैनिक अनुबंध इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे प्रयास ठोस परिणाम दे रहे हैं। भारतीय नौसेना की निरंतर प्रगति हमारे इसी संकल्प को दर्शाती है। नौसेना को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए आयात पर निर्भरता वाले शेष क्षेत्रों, विशेष रूप से खरीदार द्वारा नामित उपकरणों पर ध्यान देना आवश्यक है।”
श्री राजनाथ सिंह ने स्वदेशीकरण के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर देते हुए ‘दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियों का रोडमैप’ तैयार करने का आह्वान किया। इसका उद्देश्य ऐसी प्रौद्योगिकियों की पहचान करना और उन्हें प्राथमिकता देना है, जिनका उपयोग असैन्य व सैन्य, दोनों क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सके। उन्होंने मौजूदा ‘स्वदेशीकरण की सकारात्मक सूची’ से आगे बढ़कर प्रयासों का विस्तार करने तथा असैन्य और सैन्य जहाजरानी के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों की प्राथमिकता सूची तैयार करने पर जोर दिया। रक्षा मंत्री ने ऐसी प्रौद्योगिकियों की पहचान करने का भी सुझाव दिया, जिनका उपयोग तीनों सेनाओं और भारतीय तटरक्षक बल में किया जा सके। उन्होंने इसे ‘अंतर-सेवा संयुक्तता’ का तकनीकी अनुप्रयोग बताया, जो आत्मनिर्भरता के दूसरे चरण में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
रक्षा मंत्री ने क्वांटम प्रौद्योगिकी, युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग और मानवरहित प्रणालियों जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए रक्षा बलों, उद्योग जगत और शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसी उन्नत क्षमताओं के विकास के लिए दृढ़ संकल्प, निरंतर सहयोग तथा भविष्य की परिचालन आवश्यकताओं पर स्पष्ट ध्यान देना आवश्यक है।
इस अवसर पर नौसेना प्रमुख (सीएनएस) एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने वर्ष 2022 से ‘स्वावलंबन’ की दिशा में हुई प्रगति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नौसेना से संबंधित आईडेक्स चुनौतियों की संख्या 20 से बढ़कर 229 हो गई है, जो पूरे रक्षा क्षेत्र की कुल आईडेक्स चुनौतियों का लगभग 35 प्रतिशत है। एडमिरल ने यह भी बताया कि 3,500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 41 आवश्यकता की स्वीकृति (एओएन) मामलों को मंजूरी दी गई है, जबकि 1,900 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 25 अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
नौसेना प्रमुख ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वायत्त प्रणालियों, रोबोटिक्स और क्वांटम सेंसिंग के क्षेत्र में हो रही प्रगति से उत्पन्न अवसरों पर जोर देते हुए इन नवाचारों को व्यावहारिक क्षमताओं में बदलने की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने क्षमता विकास में तेजी लाने के लिए पांच प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही, जिनमें विचार सृजन, प्रोटोटाइप निर्माण, परीक्षण, अनुबंध और सेवा में शामिल करना तथा जीवन-चक्र संबंधी सहायता करना शामिल हैं। नौसेना प्रमुख ने स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के विकास और उन्हें सेवा में शामिल करने की प्रक्रिया तेज करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर एवं भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण हेतु भारतीय नौसेना, उद्योग जगत, स्टार्टअप व सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के बीच मजबूत सहयोग का आह्वान किया।
सचिव (रक्षा उत्पादन) संजीव कुमार ने कहा कि ‘स्वावलंबन 5.0’ रक्षा नवाचार व स्वदेशीकरण की दिशा में देश की यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह रक्षा क्षेत्र के सभी हितधारकों को एक साझा मंच प्रदान करता है, जहां वे उभरती प्रौद्योगिकियों पर चर्चा कर सकते हैं, बदलती परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के उपाय तलाश सकते हैं और स्वदेशी क्षमताओं के विकास के नए अवसरों की पहचान कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष की विषय-वस्तु ‘नवाचार और स्वदेशीकरण के माध्यम से शक्ति एवं सामर्थ्य’ रक्षा क्षेत्र में मजबूत व आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए आपसी सहयोग तथा तकनीकी प्रगति के बढ़ते महत्व को दर्शाती है। सचिव ने सभी हितधारकों से प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग की भावना अपनाने का आग्रह किया, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा को और मजबूत करने तथा राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के साझा लक्ष्य को हासिल किया जा सके।
रक्षा उत्पादन सचिव ने आईडेक्स पहल की सफलता में भारतीय नौसेना के महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि आईडेक्स स्वदेशी नवाचारों को वास्तविक खरीद परिणामों में बदलने के साथ-साथ नौसेना की परिचालन क्षमताओं को भी मजबूत कर रहा है।
इस अवसर पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ, वायु सेना के उप-प्रमुख एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित, चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीआईएससी) एयर मार्शल तेजिंदर सिंह, नौसेना के उप-प्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर, सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (एसआईडीएम) के उपाध्यक्ष श्री नीरज गुप्ता, सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारी, उद्योग एवं शिक्षा जगत के प्रतिनिधि तथा आईडेक्स के विजेता उपस्थित थे।
प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी
रक्षा मंत्री ने स्टार्टअप व सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के 100 से अधिक स्टॉलों वाली प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी का दौरा किया और नौसेना की चुनौतियों तथा समस्याओं के समाधान पर काम कर रहे नवोन्मेषकों से बातचीत की। नौसेना के उपयोगकर्ताओं के साथ मिलकर काम कर रहे स्टार्टअप और एमएसएमई ने ऐसी विशिष्ट प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया, जिन्हें नौसेना की परिचालन क्षमताओं को बढ़ाने के लिए विकसित किया जा रहा है। प्रदर्शनी के ‘सफलता की कहानियां’ खंड में उन उत्पादों को प्रदर्शित किया गया, जिन्हें भारतीय नौसेना में शामिल किया जा रहा है।
स्वायत्त समुद्री प्लेटफॉर्म, युद्ध में क्वांटम प्रौद्योगिकी और एआई का उपयोग, निरंतर निगरानी, सुदृढ़ नौवहन, उन्नत संचार और ड्रोन-रोधी तकनीकें स्वदेशी विकास के व्यापक दायरे को दर्शाती हैं। रक्षा मंत्री ने वर्ष 2022 में ‘स्वावलंबन’ की शुरुआत के बाद हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मंच ने भारतीय नौसेना की परिचालन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में निरंतर योगदान दिया है। उन्होंने विश्वसनीय एवं उच्च गुणवत्ता वाली स्वदेशी प्रौद्योगिकियां विकसित करने की भारतीय उद्योग की क्षमता पर भरोसा जताया और कहा कि इस कार्यक्रम में प्रदर्शित नवाचार देश की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दर्शाते हैं।
नवप्रवर्तकों के प्रकाशनों और उनकी उपलब्धियों को मिली मान्यता
