लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने आज संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों (पीएसी) से सार्वजनिक धन के संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने बल देकर कहा कि सरकारी खजाने से निकाले गए हर एक रुपये का उचित हिसाब होना चाहिए और जिस उद्देश्य के लिए उसे आवंटित किया गया था उसी के लिए उसका पूरा उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और उत्तरदायित्व लोकतंत्र की आधारशिला हैं और सार्वजनिक व्यय का असली पैमाना यह होना चाहिए कि इससे आम नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया है।
श्री बिरला ने तिरुवनंतपुरम में संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों के सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि पीएसी संसदीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण संस्था है। इस पर सार्वजनिक व्यय की जांच करने, वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने और कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने का उत्तरदायित्व होता है। उन्होंने कहा कि इन समितियों का काम केवल खातों की जांच या लेखा परीक्षा की रिपोर्ट देखने तक सीमित नहीं है; उन्हें यह भी देखना चाहिए कि क्या निर्धारित किए गए उद्देश्य सार्वजनिक धन से पूरे हुए हैं और क्या वे परिणाम मिले हैं जिनके लिए यह धन आवंटित किया गया था।
श्री बिरला ने लेखा परीक्षा की आपत्तियों के 10, 15 या 20 वर्षों तक अनसुलझे रहने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक मामलों का लंबित रहना पूरी व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने ठोस, व्यवस्थित और समयबद्ध कार्य योजना बनाने का आह्वान किया ताकि लेखा परीक्षा संबंधी आपत्तियों और उन पर की जाने वाली कार्रवाई को बिना किसी अनावश्यक देरी के पूरा किया जा सके। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर निगरानी, समीक्षा और समय-समय पर इसके संबंध में अनुवर्ती कार्रवाई की व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए ताकि उत्तरदायित्व केवल कागजों तक सीमित न रहे बल्कि समय रहते सुधारात्मक कदम भी उठाए जाएं। श्री बिरला ने लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के रूप में विपक्ष के किसी सदस्य को नियुक्त करने की अनूठी लोकतांत्रिक परंपरा का जिक्र करते हुए, कहा कि यह प्रथा भारत के संसदीय लोकतंत्र की परिपक्वता, समावेशिता और मजबूती को दर्शाती है। समिति में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक व्यय की जांच के दौरान अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ सकें। उन्होंने इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक संस्थाओं की उस क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया जो एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठ सकती हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि भले ही सदस्य अलग-अलग राजनीतिक दलों से हों, उनकी विचारधाराएं अलग हों और नीतियों तथा शासन को लेकर उनके विचार भिन्न हों, लेकिन जब सार्वजनिक धन की सुरक्षा की बात आती है, तो यह सबकी साझा जिम्मेदारी होती है। लोक लेखा समिति (पीएसी) को संवाद, सहयोग, आम सहमति और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या सरकार की आलोचना करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग या बर्बादी न हो, अनियमितताओं और लीकेज को रोका जा सके और कार्यपालिका (सरकार) जनता के प्रति जवाबदेह बनी रहे। उन्होंने बल देकर कहा कि नागरिकों का भरोसा ही लोकतांत्रिक शासन की नींव है। सार्वजनिक धन का हर एक रुपया लोगों की आकांक्षाओं और उनके योगदान को दर्शाता है, इसलिए इसे वित्तीय औचित्य के उच्चतम मानकों के साथ खर्च किया जाना चाहिए।
लोकसभा अध्यक्ष ने इस बात पर बल दिया कि सार्वजनिक व्यय का मूल्यांकन केवल आंकड़ों, आवंटन और उपयोगिता प्रमाण-पत्रों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। समितियों को अवसंरचना से जुड़ी परियोजनाओं के मामले में जहां भी उचित हो, परियोजना स्थलों का दौरा करना चाहिए और काम की गुणवत्ता, उसके समय पर पूरा होने और निर्धारित मानकों के पालन की जांच करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रत्यक्ष मूल्यांकन से यह पता लगाने में सहायता मिलेगी कि खर्च किए गए पैसे से अपेक्षित अवसंरचना तैयार हुई है या नहीं और क्या सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया गया है। इसी प्रकार, सामाजिक कल्याण योजनाओं के मामले में, केवल खर्च की गई राशि को देखने के बजाय उस खर्च के वास्तविक प्रभाव की जांच करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक व्यय का अंतिम उद्देश्य सामाजिक भलाई और जन कल्याण होना चाहिए।
श्री बिड़ला ने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएडी) की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि सीएजी की लेखा परीक्षा के निष्कर्षों की जांच, की गई कार्रवाई की रिपोर्ट की समीक्षा और सिफारिशों पर अनुवर्ती कार्रवाई करना, लोक लेखा समिति (पीएसी) के कामकाज का अभिन्न अंग है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन का उपयोग पारदर्शी और कुशल तरीके से तथा पूरी तरह से उसी उद्देश्य के लिए किया जाए जिसके लिए उसे स्वीकृत किया गया था। जहां प्रणालीगत सुधारों की आवश्यकता हो, वहां समितियों को उचित मार्गदर्शन देना चाहिए और सुधारात्मक उपायों की सिफारिश करनी चाहिए। उन्होंने संसद और राज्य विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों (पीएसी) से आग्रह किया कि वे इस सम्मेलन का उपयोग अपने अनुभवों, विचारों, नवाचारों और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिए एक प्रभावी मंच के रूप में करें। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने अधिक पारदर्शिता, मजबूत वित्तीय निगरानी और बेहतर मूल्यांकन प्रणाली अपनाई है उन्हें अपने तौर-तरीके साझा करने चाहिए ताकि अन्य राज्य भी उनसे सीख सकें। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि उत्तरदायित्व के तंत्र को मजबूत करने के लिए राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से पूरे देश में सुशासन को बढ़ावा मिलेगा।
अध्यक्ष महोदय ने भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि बदलती परिस्थितियों को देखते हुए समितियों को अपनी जांच और निगरानी के तरीकों को लगातार मजबूत करने की आवश्यकता है। खर्च के बड़े डेटा का विश्लेषण करने, नए रुझानों की पहचान करने, संभावित वित्तीय अनियमितताओं का पता लगाने और लेखा परीक्षा में की गई टिप्पणियों के संबंध में निगरानी में सुधार करने के लिए प्रौद्योगिकी, डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने शासन में नागरिकों की भागीदारी के महत्व पर भी बल दिया और कहा कि सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में अधिक पारदर्शिता होने से लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास मजबूत होता है। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें सार्वजनिक खर्च की बारीकी से निगरानी की जाती है, खातों की गहन जांच होती है और समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई की जाती है, यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि सरकारी संसाधनों का लाभ लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचे। उन्होंने कहा कि समय के साथ लोक लेखा समिति (पीएसी) के कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियों का विस्तार हुआ है। इस समिति ने लेखा परीक्षा की रिपोर्टों और सार्वजनिक खातों की जांच करने के अतिरिक्त सार्वजनिक व्यय, सरकारी विभागों के कामकाज, प्रशासनिक सुधारों और कार्यक्रमों के मूल्यांकन पर अपनी सिफारिशों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उन्होंने लोक लेखा समिति के हाल ही में हुए शताब्दी समारोहों का उल्लेख करते हुए कहा कि समिति के मूलभूत सिद्धांतों को उसकी भविष्य की प्राथमिकताओं का मार्गदर्शन जारी रखना चाहिए, और उस अवसर पर की गई प्रतिबद्धताओं को समिति की कार्यप्रणाली में ठोस सुधारों के रूप में बदला जाना चाहिए। अध्यक्ष महोदय ने इस बात पर भी बल दिया कि समितियों के अधिकार क्षेत्र के भीतर केंद्र-राज्य साझेदारी और सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) के माध्यम से लागू की जाने वाली योजनाओं की प्रभावी वित्तीय जांच होनी चाहिए।
श्री बिड़ला ने विश्वास जताया कि इन चर्चाओं से ऐसे रचनात्मक सुझाव और ठोस परिणाम सामने आएंगे जो वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को मजबूत करेंगे। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन से निकलने वाले प्रस्तावों से निगरानी, लेखा परीक्षा के संबंध में समय-समय पर कार्रवाई और सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता में सुधार आना चाहिए। इसका साझा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनता के पैसे का हर एक रुपया उत्तरदायित्व के साथ और उसी काम के लिए खर्च हो जिसके लिए उसे आवंटित किया गया था।
उद्घाटन सत्र में केरलम के मुख्यमंत्री श्री वी. डी. सतीसन; राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश; लोकसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष श्री के. सी. वेणुगोपाल; केरलम विधानसभा के अध्यक्ष श्री तिरुवंचूर राधाकृष्णन; और केरलम विधानसभा की पीएसी के अध्यक्ष श्री के. एन. बालगोपाल शामिल हुए और उन्होंने सभा को संबोधित किया। इस सत्र में विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों, सदस्यों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर 'लोक लेखा समिति सम्मेलन स्मारिका 2026' का भी विमोचन किया गया।
भारत की संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष ने कहा है कि उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए वित्तीय जांच का परिणाम-केंद्रित होना आवश्यक है; उन्होंने समय पर लेखा परीक्षा कराने और जन कल्याणकारी कार्यक्रमों की संतुलित समीक्षा करने का आह्वान किया।
लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष श्री के.सी. वेणुगोपाल ने अपने स्वागत भाषण में विधायी वित्तीय जांच को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सार्वजनिक व्यय से ठोस परिणाम मिलें, सेवा वितरण में सुधार हो और नागरिकों को वास्तविक लाभ प्राप्त हों। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि उत्तरदायित्व केवल खर्च की जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि संसदीय निगरानी का दृष्टिकोण परिणाम-केंद्रित होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जनता का हर एक रुपया समझदारी से खर्च हो और अपने निर्धारित उद्देश्य को पूरा करे। उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि संसद के प्रत्येक सत्र के दौरान कम से कम एक पीएसी रिपोर्ट और उस पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई पर चर्चा होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, उन्होंने समय पर लेखा परीक्षा कराने, विभिन्न क्षेत्रों की संतुलित समीक्षा करने और प्रमुख कल्याणकारी कार्यक्रमों तथा बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गहन जांच करने के महत्व पर बल दिया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग व्यापक रूप से जनहित में हो।
Thiruvananthapuram, Keralam में आयोजित हो रहे दो दिवसीय Conference of Chairpersons of Public Accounts Committees of Parliament of India and State/UT Legislatures के उद्घाटन समारोह को संबोधित किया। मुझे ख़ुशी है कि सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से मनोहारी प्रदेश केरलम की इस धरती पर, जहां लोकतांत्रिक परंपराएं समृद्ध रही हैं; संसद और राज्य विधानमंडलों की PAC के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर “Audit, Accountability and Good Governance – The Evolving Role of the PAC” विषय पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में Public Accounts Committee (लोक लेखा समिति) का एक ऐतिहासिक महत्व रहा है। आजादी से पहले भी इस समिति का अस्तित्व था और स्वतंत्रता के बाद भी हमने एक महत्वपूर्ण संसदीय परंपरा विकसित की, जिसके अंतर्गत विपक्ष के वरिष्ठ सदस्य को इस समिति का सभापति बनाया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक धन के उपयोग की निष्पक्ष और प्रभावी निगरानी हो। यह हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी ताकत है, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि मिलकर कार्य करते हैं। संसद और राज्य विधान मंडल कानून बनाते हैं तथा बजट पारित करते हैं। बजट के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि जनता का धन Infrastructure Development, Social Welfare Schemes और जनकल्याण के विभिन्न कार्यों पर खर्च हो। इस धन का निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप उपयोग सुनिश्चित करने में Public Accounts Committee की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मेरा मानना है कि सामाजिक कल्याण की योजनाओं में केवल बजट आवंटन और धनराशि खर्च होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस धन के उपयोग के बाद समाज पर उसका क्या प्रभाव पड़ा, इसका मूल्यांकन करना भी Public Accounts Committee की जिम्मेदारी है। इस दिशा में यह समिति दल से ऊपर उठकर संसदीय निष्पक्षता के साथ काम करती है। क्योंकि Public Accounts Committee के कार्य में सभी का साझा उद्देश्य एक ही होता है – शासन में जवाबदेही सुनिश्चित करना और कार्यपालिका में पारदर्शिता लाना। देश के विभिन्न प्रदेशों से इस सम्मेलन में शामिल हुए PAC के सभापतियों और सदस्यों का आह्वान किया कि बदलते परिप्रेक्ष्य में PAC के कामकाज को प्रभावी बनाने के लिए हमें बेहतर Technology का उपयोग करना होगा। Data Analysis और Artificial Intelligence के माध्यम से हम आंकड़ों का बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं, खर्च के रुझानों को समझ सकते हैं, संभावित जोखिमों की पहचान कर सकते हैं और वित्तीय अनियमितताओं पर प्रभावी ढंग से अंकुश लगा सकते हैं। हालांकि Technology के साथ जवाबदेही और मानवीय संवेदनशीलता का भी समन्वय आवश्यक है, ताकि सरकारी धन का उपयोग केवल योजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के कल्याण और आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में भी सहायक हो। मुझे आशा है कि दो दिनों के इस सम्मेलन में संसद तथा राज्य विधानमंडलों की Public Accounts Committees अपने अनुभवों, विचारों और दृष्टिकोणों को साझा करेंगी, एक-दूसरे की best practices से सीखेंगी, उपयोगी सुझाव सामने आएंगे; जिससे हम अपनी लोक लेखा समितियों को और अधिक मजबूत तथा प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
