भारत का स्वदेशी क्षमताओं, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक सह-सृजन के माध्यम से महासागर अनुसंधान और अन्वेषण के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करने का लक्ष्य है। यह बात केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने रक्षा मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय समुद्री फाउंडेशन द्वारा आयोजित हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद (आईपीआरडी) 2026 को संबोधित करते हुए कही।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हाल के वर्षों में वैज्ञानिक मिशनों के प्रति भारत का दृष्टिकोण मिशन मोड रूपरेखा पर आधारित रहा है, जिसके तहत अनुसंधान को अलग-अलग मंत्रालयों तक सीमित रखने के बजाय अनेक विभागों और संस्थानों को एक साथ लाया जा रहा है। उन्होंने भारत की समुद्री और गहरे समुद्र संबंधी क्षमताओं को आगे बढ़ाने में महासागर विज्ञान, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, परमाणु विज्ञान, भू-विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स के बीच बढ़ते समन्वय को रेखांकित किया।
गहरे समुद्र के अन्वेषण में भारत की स्वदेशी क्षमताओं को रेखांकित करते हुए, मंत्री महोदय ने कहा कि चेन्नई स्थित राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) ने मध्य हिंद महासागर बेसिन में 5,000 से 6,000 मीटर की गहराई पर परीक्षण करने की क्षमता विकसित कर ली है। उन्होंने ओशन मिनरल एक्सप्लोरर का भी उल्लेख किया, जो जलतापीय सल्फाइड निक्षेपों का उच्च-रिज़ॉल्यूशन अन्वेषण करने में सक्षम है। इनमें से कई निक्षेपों की पहचान पहले ही की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधनों में दो बार डीप ओशन मिशन का उल्लेख किया जाना, उच्चतम स्तर पर महासागरीय संसाधनों को दी गई प्राथमिकता और भारत के भविष्य के लिए उनके रणनीतिक महत्त्व को दर्शाता है।
समुद्रयान मिशन का उल्लेख करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मत्स्य सबमर्सिबल को तीन समुद्र-अन्वेषकों को 5,000–6,000 मीटर की गहराई तक ले जाने के लिए तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि भारत वर्ष 2028 तक 6,000 मीटर तक की गहराई में अपना पहला मानवयुक्त डीप सी मिशन भेजने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह देश के स्वदेशी डीप-ओशन अन्वेषण कार्यक्रम में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के साथ समानता दर्शाते हुए, मंत्री महोदय ने कहा कि देश गहरे समुद्र और अंतरिक्ष अन्वेषण के उल्लेखनीय समेकन की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने यह परिकल्पना व्यक्त की, कि एक भारतीय लगभग 6,000 मीटर की गहराई तक गहरे समुद्र के सफर पर निकले और लगभग उसी समय कोई अन्य भारतीय अंतरिक्ष की यात्रा पर। यह देश की बढ़ती वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को दर्शाता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के महासागर अनुसंधान को अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं से लगातार अधिक सहयोग मिल रहा है। उन्होंने समर्पित उपग्रहों का उल्लेख किया, जो महासागरीय रंग, समुद्र की सतह के तापमान और पवन सदिशों के अवलोकन के माध्यम से महासागर संबंधी अनुसंधान में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये क्षमताएँ महासागर अवलोकन के दायरे का विस्तार कर रही हैं और भविष्य में महासागरों से पवन एवं सौर ऊर्जा सहित नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के अन्वेषण में भी सहयोग कर सकती हैं।
समग्र सरकारी और समग्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्त्व पर जोर देते हुए, मंत्री महोदय ने भारत के महासागर संबंधी मिशनों में विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों और विभागों के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने समुद्री जल के विलवणीकरण में परमाणु प्रौद्योगिकी की भूमिका का उल्लेख किया, जिसमें भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के सहयोग से स्थापित कल्पक्कम स्थित विलवणीकरण संयंत्र और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के माध्यम से विकसित लक्षद्वीप स्थित निम्न-तापमान विलवणीकरण सुविधा शामिल हैं।
मंत्री महोदय ने कहा कि ये पहलें दर्शाती हैं कि तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता सहित राष्ट्रीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न वैज्ञानिक विषय और प्रौद्योगिकियाँ किस प्रकार मिलकर काम कर सकती हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि महासागर अनुसंधान को आगे बढ़ाने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण होगा, क्योंकि महासागर देशों द्वारा निर्धारित राजनीतिक सीमाओं का पालन नहीं करते। समुद्री प्रदूषण और महासागर के तापमान में बदलाव जैसे मुद्दों के प्रभाव राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्रों से परे तक फैलते हैं, जिससे सामूहिक वैज्ञानिक प्रयास आवश्यक हो जाते हैं।
मंत्री महोदय ने संयुक्त वैज्ञानिक मिशनों, अनुसंधान सुविधाओं तक पारस्परिक पहुंच और डेटा साझाकरण पर आधारित वैश्विक रणनीतियों और साझेदारियों का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण “एक महासागर, साझा ज्ञान और न्यायसंगत समृद्धि” के सिद्धांत से निर्देशित होना चाहिए। साथ ही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इतिहास, संस्कृतियों और भौगोलिक स्थितियों की विविधता को सहयोग सुदृढ़ करने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
मंत्री महोदय ने क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ करने के लिए प्रमुख प्राथमिकताओं की रूपरेखा प्रस्तुत की। इनमें अवलोकन संबंधी कमियों को दूर करना और चरम घटनाओं के पूर्वानुमान में सुधार करना; तटीय एवं द्वीपीय क्षेत्रों के लिए क्षेत्रीय जलवायु सेवा साझेदारियाँ स्थापित करना; जिम्मेदार और सुलभ महासागरीय प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना; गहरे महासागर संबंधी अनुसंधान को आगे बढ़ाना तथा महासागरीय संसाधनों के संरक्षण और उनके न्यायसंगत उपयोग को सुदृढ़ करना शामिल है।
अनुसंधान एवं नवाचार के वित्तपोषण की भूमिका को रेखांकित करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना और अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी को गति देने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (आरडीआई) कोष की घोषणा का उल्लेख किया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आरडीआई कोष में 50:50 इक्विटी-आधारित दृष्टिकोण का प्रावधान है, जो निजी क्षेत्र के हितधारकों और निवेशकों को अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी के उभरते क्षेत्रों में सरकार के साथ मिलकर भागीदारी करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नए क्षेत्रों के विकास और भारत की तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए सरकारी विभागों, वैज्ञानिक संस्थानों, निजी क्षेत्र के हितधारकों और निवेशकों को मिलकर काम करना चाहिए।
महासागर अन्वेषण को विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय विज़न से जोड़ते हुए, मंत्री महोदय ने कहा कि देश के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आर्थिक मूल्य संवर्धन के नए स्रोतों की पहचान करना आवश्यक होगा। उन्होंने कहा कि इस क्षमता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे संसाधनों में निहित है, जिन्हें अभी तक खोजा नहीं गया है या जिनका अन्वेषण बहुत कम हुआ है। डीप ओशन ऐसे प्रमुख अवसरों में से एक है।
प्रतिभागियों के साथ संवाद के दौरान, डॉ. जितेंद्र सिंह ने परमाणु ऊर्जा चालित पोतों की संभावनाओं और समुद्री परिवहन में स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य से जुड़े एक प्रश्न का भी उत्तर दिया। उन्होंने शांति अधिनियम के तहत परमाणु क्षेत्र को हाल ही में निजी भागीदारी के लिए खोले जाने और वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के भारत के लक्ष्य का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डीप ओशन मिशन के तहत महासागरों से नवीकरणीय ऊर्जा उत्पन्न करने की विभिन्न संभावनाओं का भी पता लगाया जा रहा है, जिनमें सौर पैनलों, महासागरीय पवन और तापमान अथवा ऊर्जा प्रवणताओं के माध्यम से ऊर्जा का उत्पादन शामिल है।
स्वच्छ भारत पहल को महासागरों तक विस्तृत करने के सुझाव पर प्रतिक्रिया देते हुए, मंत्री महोदय ने कहा कि सरकार पहले ही वार्षिक महासागर स्वच्छता अभियान शुरू कर चुकी है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इसकी शुरुआत को याद करते हुए उन्होंने कहा कि तब से यह पहल एक वार्षिक प्रयास के रूप में विकसित हुई है, जिसमें तटीय जिलों के प्रशासन, भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और अन्य हितधारकों की भागीदारी होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समुद्री प्रदूषण किसी एक देश तक सीमित नहीं रह सकता और महासागरों को स्वच्छ बनाने की दिशा में किए गए प्रयासों से व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लाभ होगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और वैज्ञानिक ज्ञान के जिम्मेदाराना साझाकरण के साथ भारत की बढ़ती स्वदेशी क्षमताएँ, वैश्विक महासागर अनुसंधान और अन्वेषण में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण होंगी। उन्होंने हितधारकों से महासागरीय संसाधनों के शांतिपूर्ण, सतत और न्यायसंगत उपयोग की दिशा में सामूहिक रूप से काम करने का आह्वान किया, जिससे विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को साकार करने में योगदान मिल सके।
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