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विश्व रजोनिवृत्ति दिवस 2026: आयुर्वेद रजोनिवृत्ति स्वास्थ्य के लिए समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है

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DetailInformation
Date18 October 2026 (Sunday)
Time4:36 AM
Topic / Ministryआयुष
Languageहिन्दी · Read in English
Reading time5 min (945 words)

विश्व रजोनिवृत्ति दिवस 2026 (18 अक्टूबर) पर आयुष मंत्रालय रजोनिवृत्ति के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता, निवारक देखभाल और व्यापक दृष्टिकोण की अहमियत को रेखांकित कर रहा है। मंत्रालय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान केंद्रीय परिषद (सीसीआरएएस) के माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य, भावनात्मक कल्याण और जीवन की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए रजोनिवृत्ति स्वास्थ्य की बेहतर समझ विकसित करना चाहता है।

रजोनिवृत्ति एक स्वाभाविक जैविक अवस्था है, जिसे अंडाशय के रोमछिद्रों की सक्रियता खत्म होने के बाद मासिक धर्म के स्थायी रूप से रुक जाने के रूप में परिभाषित किया जाता है। आमतौर पर यह 45 से 55 वर्ष की आयु के बीच आती है। रजोनिवृत्ति के दौरान कई शारीरिक और मनोवैज्ञानिक बदलाव हो सकते हैं, जैसे अनियमित मासिक धर्म, गर्माहट, योनि में सूखापन, नींद की समस्या, मनोदशा में बदलाव, जोड़ों में दर्द और चिंता। आयुर्वेद में इस अवस्था से जुड़े लक्षणों का विवेचन रजोनिवृत्ति और उससे संबंधित नैदानिक लक्षणों के संदर्भ में किया जाता है। जीवन के इस चरण में महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए इन लक्षणों की पहचान और उचित प्रबंधन महत्वपूर्ण हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार रजोनिवृत्ति की प्रक्रिया धीरे-धीरे हो सकती है और आमतौर पर मासिक धर्म चक्र में बदलाव से इसकी शुरुआत होती है। रजोनिवृत्ति के आसपास का समय वह अवधि है जो इन लक्षणों के पहली बार दिखने से लेकर अंतिम मासिक धर्म के एक वर्ष बाद तक चलती है। यह कई वर्षों तक जारी रह सकता है और शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक तथा सामाजिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। रजोनिवृत्ति के लक्षणों को कम करने में हार्मोनल और गैर-हार्मोनल, दोनों तरह के उपचार सहायक हो सकते हैं।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने जोर देते हुए कहा, “महिलाओं के स्वास्थ्य पर जीवन के हर चरण में, रजोनिवृत्ति सहित, निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। आयुर्वेद एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है जो रोकथाम, उचित जीवनशैली और व्यक्तिगत देखभाल पर बल देता है। आयुष मंत्रालय इस क्षेत्र में अनुसंधान और वैज्ञानिक प्रमाणीकरण को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है, साथ ही महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके कल्याण और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ावा देने वाले उपायों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए भी प्रतिबद्ध है।”

सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर रबीनारायण आचार्य ने जोर देते हुए कहा, “आयुर्वेद रजोनिवृत्ति को एक प्राकृतिक परिवर्तन मानता है, न कि कोई विकार। रसायन चिकित्सा, आहार संबंधी मार्गदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी अभ्यासों के माध्यम से महिलाएं इस चरण को संतुलन और सहजता से पार कर सकती हैं। सीसीआरएएस में, हमारा शोध अशोकारिष्ट और अमलकी रसायन जैसे पारंपरिक सूत्रों की प्रभावशीलता को प्रमाणित करने पर केंद्रित है, जो हार्मोनल संतुलन, हड्डियों के स्वास्थ्य और भावनात्मक लचीलेपन को बढ़ावा देने में सहायक हैं। जागरूकता और निवारक देखभाल के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाना हमारे मिशन का मुख्य उद्देश्य है।”

सीसीआरएएस के उप महानिदेशक डॉ. एन. श्रीकांत ने कहा, “रजोनिवृत्ति एक प्राकृतिक परिवर्तन है जिसके लिए सचेत देखभाल आवश्यक है। आयुर्वेद आहार, रसायन चिकित्सा, योग और भावनात्मक कल्याण के क्षेत्र में समय-परीक्षित पद्धतियों के माध्यम से महिलाओं को संतुलन, स्फूर्ति और आत्मविश्वास के साथ इस चरण से गुजरने में सक्षम बनाता है। सीसीआरएएस में हमारा उद्देश्य शास्त्रीय ज्ञान को साक्ष्य-आधारित समाधानों में परिवर्तित करना है जो महिलाओं के समग्र स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं।”

रजोनिवृत्ति के लक्षणों के प्रबंधन के लिए आयुर्वेद रसायन (कायाकल्प) चिकित्सा, आहार संबंधी मार्गदर्शन, परामर्श, योग और हर्बल औषधियों के माध्यम से बहुआयामी उपाय सुझाता है। प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं:

रसायन और जीवनशैली संबंधी हस्तक्षेप: जीवन शक्ति बनाए रखने और अपक्षयी बदलावों से निपटने के लिए पारंपरिक रूप से स्फूर्तिदायक जड़ी-बूटियों और उपयुक्त जीवनशैली बदलावों का सहारा लिया जाता है।

परामर्श और भावनात्मक समर्थन: आयुर्वेद आत्म-देखभाल, तनाव प्रबंधन और परिवार के सहयोग के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य पर बल देता है।

आयुर्वेदिक औषधियाँ: रजोनिवृत्ति से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में आयुर्वेद अशोकारिष्ट, लोध्रासव, उशीरासव, चंदनदी लोहा, आमलकी रसायन और मुक्ता शुक्ति जैसी पारंपरिक औषधियों का उपयोग करता है। इनका सेवन केवल किसी योग्य स्वास्थ्य पेशेवर की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

आहार संबंधी मार्गदर्शन: रजोनिवृत्ति के दौरान और उसके बाद व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार संतुलित और विविध आहार सामान्य स्वास्थ्य को बनाए रखने में मददगार होता है। आयुर्वेदिक आहार संबंधी सिफारिशें व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति, पाचन क्षमता और नैदानिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग तय की जा सकती हैं। मांसपेशियों की मजबूती और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य आवश्यक पोषक तत्व खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं।

योग और ध्यान: आसन, प्राणायाम, ध्यान और मेडिटेशन का नियमित अभ्यास भावनात्मक संतुलन, अच्छी नींद तथा मांसपेशियों व हड्डियों के स्वास्थ्य में सहायक हो सकता है। सेतु बंधासन, विपरीत करणी आसन, मार्जारियासन और शवासन जैसे योग अभ्यास शरीर को विश्राम देते हैं और अकड़न, पीठ दर्द व थकान कम करने में मदद कर सकते हैं। शीतली प्राणायाम और भ्रामरी प्राणायाम जैसी श्वास तकनीकें योग निद्रा के साथ मिलकर विश्राम, भावनात्मक संतुलन और नींद में सहायक हो सकती हैं।

आयुर्वेद संतुलित आहार और जीवनशैली पर जोर देता है, जिसमें सीमित मात्रा में भोजन करना, तीखे और नमकीन खाद्य पदार्थों के अत्यधिक सेवन से बचना, शराब सीमित करना, तंबाकू से परहेज करना तथा शारीरिक और भावनात्मक तनाव का प्रबंधन शामिल है।

आयुष मंत्रालय और सीसीआरएएस महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेदिक उपायों पर अनुसंधान लगातार आगे बढ़ा रहे हैं, जिसका फोकस वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने, नैदानिक परिणामों का आकलन करने और रजोनिवृत्ति के दौरान स्वास्थ्य व कल्याण के बारे में सूचित जागरूकता फैलाने पर है।

विश्व रजोनिवृत्ति दिवस 2026 पर आयुष मंत्रालय ने अधिक जागरूकता, खुलकर बातचीत तथा समय पर और उचित देखभाल का आह्वान किया है, ताकि महिलाएं आत्मविश्वास के साथ रजोनिवृत्ति का सामना कर सकें और अपने स्वास्थ्य व कल्याण को बनाए रख सकें।

अधिक जानकारी के लिए, रजोनिवृत्ति सिंड्रोम पर सीसीआरएएस आईईसी का प्रकाशन यहाँ देखा जा सकता है: https://ccras.nic.in/wp-content/uploads/2024/06/Menopausal-Syndrome.pdf

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यह पेज 18 October 2026 को प्रकाशित हुआ था। यह पेज की प्रकाशन तारीख है; लेख में बताई गई घटना की तारीख अलग हो सकती है।

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