जैविक संसाधन बाज़ारों या व्यापारियों के माध्यम से खरीदे जाने के कारण व्यक्तिगत लाभार्थियों की पहचान आसानी से नहीं हो पाती थी। इसलिए एनबीए ने विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुशंसित तथा प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित वितरण व्यवस्था अपनाई। आवंटन संबंधित जैविक संसाधनों के अनुमानित खेती क्षेत्र के अनुपात में तय किए गए, जिसका आधार कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल के माध्यम से प्रकाशित आधिकारिक कृषि आंकड़े थे।
सबसे ज़्यादा राशि पाने वाले दस राज्यों के आवंटन का ब्योरा तथा अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बांटी गई राशि नीचे दी गई है:
राशि (रुपये में)
इस आवंटन के दायरे में मक्का (ज़िया मेज़ एल.), चावल (ओरिज़ा सैटिवा एल.), बाजरा (पेनिसेटम ग्लौकम) और कपास (गॉसिपियम हिर्सुटम) जैसे कृषि जैविक संसाधन आते हैं।
मक्का और मीठे मक्के की किस्मों के उपयोग के एवज में मेसर्स कोर्टेवा क्रॉप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन, मेसर्स पायनियर हाई-ब्रेड प्राइवेट लिमिटेड, मेसर्स लिमाग्रेन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (पूर्व में मेसर्स बिस्को बायोसाइंसेज प्राइवेट लिमिटेड), मेसर्स लिमाग्रेन (थाईलैंड) कंपनी लिमिटेड, मेसर्स लिमाग्रेन ब्राजील एसए तथा मेसर्स सिंजेंटा इंडिया लिमिटेड ने एबीएस योगदान दिया। मेसर्स लिमाग्रेन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने पांच मक्का संकर, दो चावल संकर और तीन बाजरा संकरों के लिए भी योगदान किया। कपास के मामले में मेसर्स कोर्टेवा क्रॉप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने 16 किस्मों से जुड़े अनुसंधान के लिए तथा मेसर्स क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड ने 14 संकरों के व्यावसायिक उपयोग के लिए योगदान दिया।
कृषि क्षेत्र भारत के जैविक संसाधनों की संरक्षण व्यवस्था में एक संभावित योगदानकर्ता बनकर उभर रहा है, जिससे पता चलता है कि कृषि जैविक संसाधनों का उपयोग संरक्षण और स्थानीय समुदायों के लिए कैसे लाभ पैदा कर सकता है। ऐसा योगदान भारत की कृषि जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग में मददगार हो सकता है। इसमें पारंपरिक किस्में और आनुवंशिक विविधता भी शामिल हैं।
जैव विविधता परिषद (एनबीए) अब तक कृषि क्षेत्र से मिले 86 करोड़ रुपये विभिन्न लाभार्थियों को बांट चुकी है। राज्य जैव विविधता परिषदों और केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषद को आवंटित धनराशि का उपयोग विशेष रूप से जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 32(2) के अंतर्गत निर्दिष्ट गतिविधियों के लिए किया जाएगा। इन गतिविधियों में जैव विविधता का दस्तावेजीकरण, संरक्षण व सतत उपयोग, स्थानीय जैव विविधता शासन को मजबूत करना, अनुसंधान, क्षमता निर्माण तथा सामुदायिक आजीविका को बेहतर बनाना शामिल है।
अब तक एनबीए 203 करोड़ रुपये से अधिक की राशि वितरित कर चुका है, जिससे जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका को सहारा मिला है। भारत 19-30 अक्टूबर 2026 को आर्मेनिया के येरेवन में होने वाले जैविक विविधता सम्मेलन (सीओपी 17) के सत्रहवें सम्मेलन की तैयारी में जुटा है। ऐसे समय में ये प्रयास देश की जैविक विरासत के संरक्षण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं और यह भी सुनिश्चित करते हैं कि इससे मिलने वाले लाभ स्थानीय समुदायों के कल्याण में योगदान दें।
पीके/केसी/आरटी/एमकेएस
