उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित किया। उन्होंने इस अवसर पर उत्तीर्ण छात्रों, उनके माता-पिता, संकाय सदस्यों और विश्वविद्यालय समुदाय को बधाई दी। उन्होंने "नशीली दवाओं से मुक्ति" की शपथ लेने में भी उपस्थित लोगों का नेतृत्व किया और मेधावी उत्तीर्ण छात्रों को स्वर्ण पदक प्रदान किए।
Vice President Shri C. P. Radhakrishnan addressed the Second Convocation of Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University in New Delhi. He highlighted Sanskrit as the “golden string” connecting India’s many languages and emphasised the need to preserve, study and take India’s ancient knowledge traditions to future generations.
संस्कृत विद्यापीठ से केंद्रीय विश्वविद्यालय तक विश्वविद्यालय की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए, श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि अब इस संस्थान का संस्कृत अध्ययन के लिए एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में स्थापित होने का समय आ गया है, जो इसके संस्थापक पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री के विजन को पूरा करता है। श्री शास्त्री को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने कहा कि "जय जवान, जय किसान" का उनका अमर आह्वान केवल एक नारा नहीं था, बल्कि यह अपनी सीमाओं की रक्षा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के भारत के संकल्प को दर्शाता है।
उपराष्ट्रपति ने ए++ का उच्चतम नैक ग्रेड हासिल करने और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान करने के लिए विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि जहां प्रत्येक भारतीय भाषा ने राष्ट्र को समृद्ध किया है, वहीं संस्कृत भारत की कई भाषाओं के मोतियों को एक भव्य माला में पिरोने वाला "स्वर्णिम धागा" है। उन्होंने सुभाषितों के माध्यम से पूरे परिसर में संस्कृत को जीवित रखने के विश्वविद्यालय के प्रयासों, विद्यापीठ पंचांग के प्रकाशन की 44 साल की परंपरा और प्राकृत और वास्तु शास्त्र सहित शास्त्रीय विषयों के शिक्षण की भी सराहना की।
श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने इस बात पर जोर दिया कि भारत का विकास इसकी सभ्यतागत विरासत में निहित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कई पहलों ने संस्कृत के पुनरुत्थान और भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए एक अनुकूल इकोसिस्टम का निर्माण किया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और अष्टदशी योजना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि दुर्लभ संस्कृत ग्रंथों को लुप्त नहीं होने दिया जाना चाहिए और उन्हें संरक्षित, अध्ययन और भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए।
