खेती की जमीन पर फसल और सौर बिजली का साथ-साथ उत्पादन छोटे किसानों के अनुकूल होना चाहिए। भारत मंडपम में तीन दिवसीय 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह बात कही। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किसानों को अन्न के साथ ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने की दिशा बताई। चौहान ने कहा कि नीति का केंद्र देश के 85 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हों और तकनीक उनके खेत पर व्यावहारिक रूप से काम करे।
चौहान ने प्रतिनिधियों और किसानों को समझाया कि एग्रीवोल्टाइक में एक ही भूखंड के ऊपर सौर पैनल बिजली बनाते हैं और नीचे खेती जारी रहती है। उन्होंने इसे जमीन के दोहरे उपयोग और किसान की आय के नए अवसर से जोड़ा। आधुनिक जीवन तथा सिंचाई में बिजली की जरूरत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कृषि और ऊर्जा उत्पादन को साथ लाना उपयोगी हो सकता है। इसके लिए केवल तकनीक की उपलब्धता पर्याप्त नहीं, खेत की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप उसका उपयोग भी महत्वपूर्ण है।
कृषि मंत्री ने भारत के खाद्यान्न आयात पर निर्भर रहने से भरे हुए अनाज भंडारों तक की यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत और कृषि निर्यात 52.55 अरब डॉलर बताया। उनके अनुसार रबी 2026-27 की बुवाई शुरू हो चुकी है और दलहन तथा तिलहन को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
भारत में औसत जोत 0.96 हेक्टेयर होने और 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे या सीमांत होने की स्थिति को चौहान ने मुख्य चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि किसान अपनी कमाई निवेश करता है, इसलिए मॉडल में जोखिम और व्यवहार्यता स्पष्ट होनी चाहिए। सौर संयंत्र लगाने से कृषि उत्पादन बंद नहीं होना चाहिए। पैनलों की ऊंचाई, खंभों की दूरी और जुताई के लिए स्थान इस तरह तय हों कि किसान हर वर्ष फसल तथा फसल चक्र चुन सके। केवल पैनलों के नीचे कुछ पौधे लगाने को उन्होंने पर्याप्त नहीं माना।
मंत्री ने पैनलों से आने वाले वर्षा जल का निकास और संचयन सुनिश्चित करने को कहा, जिससे मिट्टी का कटाव न हो। बिजली खरीद, ग्रिड संपर्क और समय पर पारदर्शी भुगतान की व्यवस्था भी जरूरी बताई गई। उन्होंने एफपीओ की भागीदारी तथा ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को उपकरण चलाने, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण देने का सुझाव दिया। कंपनी के बीच में परियोजना छोड़ने या अनुबंध समाप्त होने पर पैनल हटाने की जिम्मेदारी पहले तय हो। उनका कहना था कि ऐसे मामलों का आर्थिक या भौतिक बोझ किसान पर नहीं आना चाहिए।
चौहान ने नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी के साथ समन्वय का भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि कृषि मंत्रालय इस पहल को सफल बनाने के लिए ऊर्जा मंत्रालय के साथ मिलकर काम करेगा।
जोशी ने 7वें सम्मेलन को पिछले छह संस्करणों से बड़ा बताते हुए कहा कि अधिक भागीदारी के कारण अतिरिक्त हॉल की जरूरत पड़ी। उन्होंने पहली तिमाही की जीडीपी वृद्धि 7.8% बताई। मंत्री के अनुसार 2014 से पहले की लगभग 249 गीगावाट बिजली क्षमता अब 560 गीगावाट से अधिक है। गैर-जीवाश्म क्षमता 308 गीगावाट पार कर चुकी है और पिछले ढाई वर्ष में 100 गीगावाट जुड़ी है। उन्होंने बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत घटने का उदाहरण देते हुए 2012-13 की ₹11 प्रति यूनिट लागत की तुलना वर्तमान ₹2.60 प्रति यूनिट से की।
टेरी के अध्ययन का उल्लेख करते हुए जोशी ने 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में 4.75 करोड़ हेक्टेयर, लगभग 30%, को तकनीकी रूप से उपयुक्त बताया। उनके अनुसार इस उपयुक्त भूमि में महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश का हिस्सा 50 प्रतिशत है। उन्होंने अध्ययन आधारित संभावना बताई कि उपयुक्त क्षेत्र के 10 प्रतिशत पर यह व्यवस्था 2050 की अनुमानित बिजली मांग पूरी कर सकती है। फसल उपज में 10 से 20 प्रतिशत वृद्धि के अध्ययन भी उन्होंने साझा किए।
जोशी ने कहा कि पीएम कुसुम के तहत 30 लाख, यानी 3 मिलियन, कृषि पंप सौर ऊर्जा से जुड़े हैं। इससे किसानों को रात में सिंचाई करने की जरूरत घटाने और दिन में बिजली पाने में मदद मिलने की बात कही गई। उन्होंने योजना के अगले चरण में बड़े एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम की तैयारी बताई। अध्ययन का हवाला देते हुए मंत्री ने इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार की संभावना भी रखी, जिससे ग्रामीण युवाओं को अपने क्षेत्र में काम मिल सकता है।
समारोह में राज्य मंत्री श्रीपाद येसो नाईक, जर्मनी के राजदूत जैस्पर विक, नवीकरणीय ऊर्जा सचिव संतोष कुमार सारंगी और कृषि सचिव अतीश चंद्रा उपस्थित थे। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव तथा आईसीएआर महानिदेशक मांगी लाल जाट और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के महानिदेशक आशीष खन्ना ने भी भाग लिया।
उद्घाटन सत्र में एग्रीवोल्टाइक से संबंधित तकनीकी साधनों और संचार सामग्री का विमोचन किया गया। इनका उद्देश्य खेत के स्तर पर किसानों और अन्य हितधारकों को अधिक जानकारी के साथ निर्णय लेने में सहायता देना है।
