भारतीय प्रबंधन संस्था कलकत्ता (आईआईएम कलकत्ता) का वार्षिक व्यापार संगोष्ठी 'लैटिस 2026' का आयोजन आज कोलकाता में 'द कैपेबिलिटी डिकेड' (क्षमता का दशक) विषय के अंतर्गत किया गया। इस सम्मेलन में छात्र, उद्योग जगत के नेता और पेशेवर एक साथ आए ताकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीक, नवाचार, नेतृत्व एवं तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य में प्रभावशाली काम करने आवश्यक क्षमताओं पर चर्चा की जा सके।
इस संगोष्ठी में श्री अमिताभ नाग, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), डिजिटल इंडिया भाषिनी डिवीज़न (डीआईबीडी), डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में भाषा प्रौद्योगिकी के निर्माण एवं तैनाती के भारत के अनुभव से प्राप्त अंतर्दृष्टि साझा कीं, जिसमें एआई को मॉडल और प्रयोगों से आगे ले बड़े पैमाने पर असल दुनिया में अपनाने में आने वाली चुनौतियों पर खास ध्यान केंद्रीत किया गया।
विभिन्न जनसंख्या तक पहुंचने की चुनौतियों पर बात करते हुए, श्री नाग ने डिजिटल, भाषा एवं साक्षरता के अंतर को आपस में जुड़ी हुए चुनौती बताया और कहा कि प्रौद्योगिकी को लोगों और उनकी परिस्थितियों के अनुसार ढलना चाहिए। उन्होंने पहुंच बढ़ाने में वॉइस-फर्स्ट और बहुभाषी तकनीकों के महत्व को उजागर किया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए एआई प्रणाली को भाषा, बोली, क्षेत्र और संदर्भ के अंतर पर ध्यान देना होगा।
सत्र के दौरान इस दृष्टिकोण का व्यावहारिक अनुप्रयोग भी प्रदर्शित किया गया, जब श्री नाग के संबोधन के दौरान भाषिणी का श्रुतलेख लाइव तैनात किया गया, जिससे वास्तविक समय में भाषा अनुवाद एवं ट्रांसक्रिप्शन संभव हुआ। इस प्रदर्शन से पता चला कि भाषा एआई लाइव परिवेश में कैसे काम कर सकता है और नियंत्रित या प्रायोगिक वातावरण से आगे बहुभाषी संचार में मदद कर सकता है।
इस बातचीत में उन संगठनात्मक एवं उत्पाद विकल्पों पर भी चर्चा हुई जो उभरती तकनीकों की सफलता को आकार देते हैं। भाषिणी के अनुभव के आधार पर, श्री नाग ने लोगों के साथ और लोगों के लिए काम करने की बात की, जिसमें 'भाषादान' के माध्यम से भाषा संसाधन बनाने में समुदाय की भागीदारी भी शामिल है। उन्होंने जोर दिया कि स्पष्ट उपयोग मामलों, तेज़ प्रयोग, गलतियों से सीखने और छोटे फीडबैक लूप्स का महत्व है ताकि विचारों से वास्तविक इस्तेमाल योग्य समाधान तक पहुंचा जा सके, और अनुसंधान एवं उत्पाद टीमों को वास्तविक दुनिया की जरूरतों के करीब लाया जा सके।
